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01-01-1970 Blog

देव गुरु बृहस्‍पति के कारण आती हैं नौकरी और शादी में रुकावटों, इन उपाय से होगा लाभ-

देव गुरु बृहस्‍पति के कारण आती हैं नौकरी और शादी में रुकावटों, इन उपाय से होगा लाभ-- प्रिय पाठकों/मित्रों, हिन्दू धर्मशास्त्रों और ज्योतिष ग्रंथों में गुरु यानी बृहस्पति को शुभ देवता और ग्रह माना गया है। इसके शुभ प्रभाव से जहां एक ओर लंबी उम्र, मनचाही नौकरी और धन के साथ पिता का प्रेम और धर्म लाभ मिलता है। वहीं कन्या के जीवनसाथी का निर्णय करने वाला भी देवगुरु बृहस्पति ही माने गए है। पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार शुभ ग्रह होने के बावजूद हमेशा गुरु शुभ फल नहीं देता। बल्कि अशुभ ग्रहों के प्रभाव में आने पर उसके बुरे प्रभाव से रोग, नौकरी या कारोबार में परेशानी, माता-पिता से विवाद और कन्या के विवाह में दिक्कतें पैदा होती है। इसलिए गुरु दोष के बुरे असर से बचने के लिए कुछ धार्मिक उपाय बताए गए हैं। इनसे गुरु को अनुकूल बनाया जा सकता है। कई बार मेहनत करने के बाद भी नौकरी या मनचाहा फल नहीं मिल पाता है। इसका कारण आपकी कुंडली में बृहस्‍पति का अशुभ प्रभाव हो सकता है। कई बार किसी अशुभ या क्रूर ग्रह की वजह से आपको अपने किसी भी काम में जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी सफलता नहीं मिल पाती है। मेहनत तो हर कोई करता है लेकिन मेहनत का फल बहुत कम लोगों को मिलता है। किसी को प्रयास करने के बाद भी अच्‍छी नौकरी नहीं मिलती है या घर में धन की कमी हमेशा रहती है या आपकी शादी में रुकावट आ रही है या कोई भी समस्‍या है तो इसका कारण आपकी कुंडली में बैठा बृहस्‍पति हो सकता है। ========================================================================= बृ‍हस्‍पति होता है कारण, विवाह विलम्ब/देरी का --- जी हां, ये सच बात है कि कुंडली में अगर बृहस्‍पति देव अशुभ प्रभाव दे रहे हैं तो आपके हर काम में रुकावट आती है। इन सभी के अलावा महादशा भी विवाह की घटना तय करने में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारक निभाता है। दशा पैटर्न में बृहस्पति की किसी भी भूमिका को (महा दशा प्रभु, अंतर दशा प्रभु या प्रत्यन्तर दशा भगवान के रूप में) विवाह को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। सप्तम प्रभु की भूमिका भी विवाह को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। राहु महादशा भी विवाह की घटना तय करने में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कारक निभाता है। दशा पैटर्न में बृहस्पति की किसी भी भूमिका को (महा दशा प्रभु, अंतर दशा प्रभु या प्रत्यन्तर दशा भगवान के रूप में) विवाह को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। सप्तम प्रभु की भूमिका भी विवाह को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। राहु हस्तक्षेप भी विवाह के लिए कारक माना जाता है। शुक्र गृह शादी का मुख्य कारक है और यह भी विवाह को बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की विवाह वह समय है ,जब दो अपरिचित युगल दाम्पत्य सूत्र में बंधकर एक नए जीवन का प्रारंभ करते है ,,ज्योतिष में योग ,दशा और गोचरीय ग्रह स्थिति के आधार पर विवाह समय का निर्धारण होता है ,परन्तु कभी-कभी विवाह के योग ,दशा और अनुकूल गोचरीय परिभ्रमण के द्वारा विवाह काल का निश्चय करने पर भी विवाह नहीं होता क्योकि जातक की कुंडली में विवाह में बाधक या विलम्ब कारक योग होते है |विवाह के लिए पंचम ,सप्तम ,द्वितीय और द्वादश भावों का विचार किया जाता है ,द्वितीय भाव सप्तम से अष्टम होने के कारण विवाह के आरम्भ व् अंत का ज्ञान कराता है ,साथ ही कुटुंब कभी भाव होता है ,द्वादश भाव शैया सुख के लिए विचारणीय होता है |स्त्रियों के संदर्भ में सौभाग्य ज्ञान अष्टम से देखा जाता है अतः यह भी विचारणीय है |शुक्र को पुरुष के लिए और स्त्री के लिए गुरु को विवाह का कारक माना जाता है |प्रश्न मार्ग में स्त्रियों के विवाह का कारक ग्रह शनि होता है |सप्तमेश की स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है अगर आपकी कुंडली मे गुरु दोष है तो उसकी शांति के उपाय कर के आप उसको अनुकूल कर सकते हैं और इन उपायों के बाद आपके सभी काम बनने लगेंगें। गुरुवार का दिन देवगुरु बृहस्पति को समर्पित है। इनकी कृपा से धन-समृद्धि, पुत्र और शिक्षा की प्राप्ति होती है। पीला रंग और पीली वस्तुएं इनको बहुत प्रिय हैं। बृहस्पतिवार के दिन पीले वस्त्र पहनने, पीली वस्तुओं का दान करने और घर पर पीले पकवान बनाने से यह बहुत प्रसन्न होते हैं। बृहस्पतिवार के दिन इनका उपवास रखने अौर पीले वस्त्र पहनकर, केले के वृक्ष को पीले रंग की वस्तुएं अर्पित करके पूजन करनी चाहिए। उसके उपरांत कथा सुननी अौर आरती करें। देवगुरु की पूजा से व्यक्ति के अंदर आध्यात्मिक भावना पैदा होती है। ======================================================================= जानिए देव गुरु बृहस्‍पति को शांत करने के उपाय ---- ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार बृहस्पति के उपाय हेतु जिन वस्तुओं का दान करना चाहिए उनमें चीनी, केला, पीला वस्त्र, केशर, नमक, मिठाईयां, हल्दी, पीला फूल और भोजन उत्तम कहा गया है. इस ग्रह की शांति के लए बृहस्पति से सम्बन्धित रत्न का दान करना भी श्रेष्ठ होता है. दान करते समय आपको ध्यान रखना चाहिए कि दिन बृहस्पतिवार हो और सुबह का समय हो. दान किसी ब्राह्मण, गुरू अथवा पुरोहित को देना विशेष फलदायक होता है. बृहस्पतिवार के दिन व्रत रखना चाहिए. कमज़ोर बृहस्पति वाले व्यक्तियों को केला और पीले रंग की मिठाईयां गरीबों, पंक्षियों विशेषकर कौओं को देना चाहिए. ब्राह्मणों एवं गरीबों को दही चावल खिलाना चाहिए. रविवार और बृहस्पतिवार को छोड़कर अन्य सभी दिन पीपल के जड़ को जल से सिंचना चाहिए. गुरू, पुरोहित और शिक्षकों में बृहस्पति का निवास होता है अत: इनकी सेवा से भी बृहस्पति के दुष्प्रभाव में कमी आती है. केला का सेवन और सोने वाले कमड़े में केला रखने से बृहस्पति से पीड़ित व्यक्तियों की कठिनाई बढ़ जाती है अत: इनसे बचना चाहिए। ---गुरुवार के दिन गुरु बृहस्‍पति की मूर्ति या बृहस्‍पति जी के फोटो को पीले रंग के कपड़े पर स्‍थापित करें और उसकी पूजा करें। अपनी पूजा की थाल में पीले चावल, केसरिया चंदन, पीले फूल और प्रसाद में चाहें तो चने की दाल या गुड का प्रयोग करें। ----दूसरा उपाय है कि गुरुवार के दिन बृहस्‍पति देव को प्रसन्‍न करने के लिए पीले रंग की वस्तु का दान करें। किसी गरीब व्यक्ति को या मन्दिर में जाकर दान करें। ---तीसरा उपाय है कि सूर्योदय होने से पहले उठें और भगवान विष्णु जी के सामने घी का दीया जलाएं और बेसन के लड्डू का भोग लगाएं। ---गुरुवार के दिन नहाते समय एक चुटकी हल्दी को पानी में डालकर नहाएं और इसके बाद ॐ नम: भगवते वासुदेवाय का जाप करते हुए केसर का तिलक लगाएं। --- अनिद्रा से परेशान व्यक्ति 11 बृहस्पतिवार तक केवांच की जड़ का लेप माथे पर लगाएं। -- - स्त्रियां गुरुवार को हल्दी वाला उबटन शरीर में लगाएं तो उनके दांपत्य जीवन में प्यार बढ़ता है। --- - बृहस्पति देव को प्रसन्न करने के लिए गुरुवार के दिन गाय का घी, शहद, हल्दी, पीले कपड़े, किताबें, गरीब कन्याओं को भोजन का दान अौर गुरुओं की सेवा करें। --- - गुरुवार के दिन केले का दान शुभ होता है। ---- - गुरु के अशुभ प्रभाव को कम करने अौर सभी कष्टों से छुटकारा पाने के लिए गुरुवार के दिन चमेली के फूल, गूलर, दमयंती, मुलहठी और पानी में शहद डालकर स्नान करें। -- विवाह में आ रही रुकावटों को दूर करने के लिए गुरुवार का व्रत अौर देवगुरु बृहस्पति के सामने गाय के घी का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। - गुरुवार के दिन बृहस्पति देव को पीले पुष्पों का अर्पण करके पीले चावल, पीला चंदन, पीली मिठाई, गुड़, मक्के का आटा, चना दाल आदि का भोग लगाते हैं। माथे पर हल्दी का तिलक लगाने के पश्चात हल्दी गांठ की माला से इस मंत्र के जाप करना शुभ होता है। "ॐ ऐं क्लीं बृहस्पतये नमः। --गुरुवार के दिन व्रत रखें और पीले रंग के कपड़े पहनें। यह भी कोशिश करें कि बिना नमक का भोजन हो और पीले रंग का पकवान शामिल हो। ---अगर आपकी शादी में रुकावट आ रही है या किसी ना किसी वजह से आपकी शादी में समस्‍याएं आ रही हैं तो गुरुवार को गाय को दो आटे के पेडे पर थोड़ी हल्दी लगाकर खिलाएं। ---गुरुवार के दिन केले के पेड़ के नीचे शाम के समय घी का दीपक जलाएं। ---ऐसे व्यक्ति को मन्दिर में या किसी धर्म स्थल पर निःशुल्क सेवा करनी चाहिए। ----किसी भी मन्दिर या इबादत घर के सम्मुख से निकलने पर अपना सिर श्रद्धा से झुकाना चाहिए। ---- ऐसे व्यक्ति को परस्त्री / परपुरुष से संबंध नहीं रखने चाहिए। ---- गुरुवार के दिन मन्दिर में केले के पेड़ के सम्मुख गौघृत का दीपक जलाना चाहिए। -----गुरुवार के दिन आटे के लोयी में चने की दाल, गुड़ एवं पीसी हल्दी डालकर गाय को खिलानी चाहिए। ----गुरु के दुष्प्रभाव निवारण के लिए किए जा रहे टोटकों हेतु गुरुवार का दिन, गुरु के नक्षत्र (पुनर्वसु, विशाखा, पूर्व-भाद्रपद) तथा गुरु की होरा में अधिक शुभ होते हैं। -----ऐसे व्यक्ति को अपने माता-पिता, गुरुजन एवं अन्य पूजनीय व्यक्तियों के प्रति आदर भाव रखना चाहिए तथा महत्त्वपूर्ण समयों पर इनका चरण स्पर्श कर आशिर्वाद लेना चाहिए। किसी भी जानकारी के लिए Call करें : ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री--9039390067 ===================================================================== जानिए क्यों नहीं मिलती नौकरी /रोजगार--- आज के समय में हमारे देश के युवा शिक्षित होने के बाद भी बेरोजगारी की समस्या से झूझ रहे है | समय पर युवाओं को नौकरी न मिलने पर परिवार का आर्थिक संतुलन तो बिगड़ता ही है साथ में बेरोजगार व्यक्ति मानसिक रूप से विकृत भी होने लगता है | कभी-कभी समय पर नौकरी न मिलने पर व्यक्ति गलत रास्ते को अपना लेता है और समस्या और गंभीर होने लगती है | आज के इस लेख में ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री, आपको नौकरी प्राप्ति के ऐसे 10 अचूक उपाय बताने वाले है जिनका प्रयोग आपकी नौकरी में आने वाली सभी अडचनों को दूर करने में आपके लिए सहायक सिद्ध हो सकता है | =============================================================================== ये होते हैं समय पर नौकरी न मिलने के कारण : – इस बात से तो सभी परिचित है की शिक्षित और योग्य युवाओं को समय पर नौकरी न मिलने का मुख्य कारण क्या है | जी हाँ, हमारे देश में निम्न स्तर से लेकर उच्च स्तर तक भ्रष्टाचार इसका मुख्य कारण है | किन्तु यहाँ हम नौकरी न मिलने के राजनैतिक विषय पर चर्चा न करके अलग विषय पर चर्चा करेंगे | कुंडली दोष :- ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की किसी व्यक्ति के समय पर नौकरी न मिलने का मुख्य कारण उसकी कुंडली में होने दोष हो सकते है | कुंडली दोष में मुख्यतः काल सर्प दोष , मांगलिक दोष और नक्षत्र दोष आपकी नौकरी में अड़चन के कारण बन सकते है | इसलिए किसी योग्य पंडित से अपनी कुंडली दिखाए और इन दोषों का समय पर निवारण कराएँ | आपकी नौकरी में आने वाली अड़चने अपने आप दूर होने लगेगी | गृह दोष : वर्तमान समय में आपकी कुंडली में ग्रहों के प्रतिकूल प्रभाव आपकी नौकरी में अड़चन के कारण बन सकते है | जैसे शनि दोष , राहू दोष या मंगल दोष आदि | कुंडली में गृह दोष होने पर समय पर इनके निवारण हेतु उपाय जरुर करें | ====================================================================== अपनाएं नौकरी पाने के लिए इन 10 अचूक उपाय को --- ---आज से ही शनिदेव की आराधना करना शुरू कर दे | आप प्रत्येक शनिवार को शनि मंदिर जाकर शनिदेव को सरसों तेल व काले तिल अर्पित करें व "ॐ शं शनैश्चराय नम:" मंत्र के यथासंभव जप करें | ----सात तरह के अनाज मिलाकर अपने ऊपर से सात बार वार ले व थोडा-थोडा करके सुबह-सुबह पक्षियों को खिलाना शुरू कर दे | इससे गृह दोष शांत होते है | ----अपने पूजा स्थान पर उड़ते हुए हनुमान जी की फोटो लगाये व उनकी आराधना करें | आपके नौकरी के द्वार शीघ्र ही खुलने लगेंगे | ---पीपल के पेड़ में जल चढ़ाने से सभी देवता व अपने पित्र देव प्रसन्न होते है | इसलिए रोजाना पीपल के पेड़ में जल चढ़ाये और शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे तेल का दीपक जलाये और अपने पित्र देव को याद करें | ----किसी भी दिन पानी वाले कुँए में थोडा दूध डाले और इस बारे में किसी को भी न बताये | नौकरी पाने का यह एक कारगर टोटका है | ---प्रत्येक सोमवार को शिव मंदिर जाये व शिवलिंग पर दूध और पानी चढ़ाये, साथ में थोड़े चावल व मीठा भी अर्पित करें | इस प्रकार करने के पश्चात् 2 मिनट हाथ जोड़कर बैठ जाये व भोलेनाथ से अपनी नौकरी की अरदास लगाये | भोलेनाथ जी की कृपा से आपकी नौकरी में आने वाली सभी अडचने दूर होने लगेंगी | ----प्रत्येक माह के पहले सोमवार को एक सफेद कपडे में थोड़े काले चावल बांधकर माँ काली के मंदिर में जाकर उनके चरणों में चढ़ाये | इस प्रयोग से भी नौकरी मिलने के द्वार खुलने लगते है | -----नौकरी के लिए इंटरव्यू पर जाते समय के निम्बू में 4 लोंग को फिट कर हनुमान के इस मंत्र " ॐ हनुमते नमः " का 108 बार जप करें | अब इस निम्बू को अपने बैग में रखकर इंटरव्यू के लिए जाए | इस प्रयोग के करने से आपको अवश्य ही इंटरव्यू में सफलता मिलेगी | ----एक नीम्बू को चार भागों में काटकर शाम के समय किसी सुनसान चौराहे पर जाकर चारों दिशाओं में एक -एक करके फेंक दे और बिना मुड़े वापिस घर आ जाए | इस प्रयोग को आप महीने के शुक्ल पक्ष में किसी भी दिन शुरू करके लगातार 7 दिनों तक करें | यह एक परीक्षित टोटका है | इस टोटके के करने से नौकरी में आने सभी अड़चने दूर होने लगती है और व्यापार में वृद्धि भी होने लगती है | -----41 दिनों तक हनुमान जी के मंदिर में जाकर दीपक जलाये | और पहले दिन दीपक जलाने के साथ ही हनुमान जी से अपनी नौकरी की अरदास लगाये | यदि संभव हो सके तो प्रतिदिन हनुमान जी के चरणों से सिन्दूर लेकर अपने माथे पर तिलक भी करें | विशेष ध्यान रखें---ऊपर दिए गये नौकरी पाने के सभी अचूक उपाय आपकी नौकरी मिलने में आने वाली सभी अड़चनों को दूर करने में सहायक सिद्ध हो सकते है | किन्तु इन उपायों के भरोसे रहकर प्रयास करना बंद न करें | बार-बार असफलता किसी भी व्यक्ति को अंदर से तोड़ सकती है किन्तु हताश होकर प्रयास बंद कर देने से उपरोक्त दिए गये सभी टोटके भी आपके लिए व्यर्थ सिद्ध हो सकते है | ============================================================ ====दाम्पत्य/वैवाहिक सुख के उपाय—- ----यदि जन्म कुण्डली में प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, द्वादश स्थान स्थित मंगल होने से जातक को मंगली योग होता है इस योग के होने से जातक के विवाह में विलम्ब, विवाहोपरान्त पति-पत्नी में कलह, पति या पत्नी के स्वास्थ्य में क्षीणता, तलाक एवं क्रूर मंगली होने पर जीवन साथी की मृत्यु तक हो सकती है। अतः जातक मंगल व्रत। मंगल मंत्र का जप, घट विवाह आदि करें। ---ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार कुंडली में कुछ विशेष ग्रह दोषों के प्रभाव से वैवाहिक जीवन पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे में उन ग्रहों के उचित ज्योतिषीय उपचार के साथ ही मां पार्वती को प्रतिदिन सिंदूर अर्पित करना चाहिए। सिंदूर को सुहाग का प्रतीक माना जाता है। जो भी व्यक्ति नियमित रूप से देवी मां की पूजा करता है उसके जीवन में कभी भी पारिवारिक क्लेश, झगड़े, मानसिक तनाव की स्थिति निर्मित नहीं होती है। --- सप्तम भाव गत शनि स्थित होने से विवाह बाधक होते है। अतः "ॐ शं शनैश्चराय नमः" मन्त्र का जप ७६००० एवं ७६०० हवन शमी की लकड़ी, घृत, मधु एवं मिश्री से करवा दें। -----राहु या केतु होने से विवाह में बाधा या विवाहोपरान्त कलह होता है। यदि राहु के सप्तम स्थान में हो, तो राहु मन्त्र "ॐ रां राहवे नमः" का ७२००० जप तथा दूर्वा, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें। केतु स्थित हो, तो केतु मन्त्र "ॐ कें केतवे नमः" का २८००० जप तथा कुश, घृत, मधु व मिश्री से दशांश हवन करवा दें। -----सप्तम भावगत सूर्य स्थित होने से पति-पत्नी में अलगाव एवं तलाक पैदा करता है। अतः जातक आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ रविवार से प्रारम्भ करके प्रत्येक दिन करे तथा रविवार कप नमक रहित भोजन करें। सूर्य को प्रतिदिन जल में लाल चन्दन, लाल फूल, अक्षत मिलाकर तीन बार अर्ध्य दें। ----जिस जातक को किसी भी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो नवरात्री में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक ४४००० जप निम्न मन्त्र का दुर्गा जी की मूर्ति या चित्र के सम्मुख करें। "ॐ पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्ग संसार सागरस्य कुलोद्भवाम्।।" -----ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की यदि किसी स्त्री जातिका को अगर किसी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो श्रावण कृष्ण सोमवार से या नवरात्री में गौरी-पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जप करना चाहिए- "हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया। तथा मां कुरु कल्याणी कान्त कान्तां सुदुर्लभाम।।" ----किसी लड़की के विवाह मे विलम्ब होता है तो नवरात्री के प्रथम दिन शुद्ध प्रतिष्ठित कात्यायनि यन्त्र एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर स्थापित करें एवं यन्त्र का पंचोपचार से पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जइ लड़की स्वयं या किसी सुयोग्य पंडित से करवा सकते हैं। "कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोप सुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः।।" -----ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि जन्म कुण्डली में सूर्य, शनि, मंगल, राहु एवं केतु आदि पाप ग्रहों के कारण विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो गौरी-शंकर रुद्राक्ष शुद्ध एवं प्राण-प्रतिष्ठित करवा कर निम्न मन्त्र का १००८ बार जप करके पीले धागे के साथ धारण करना चाहिए। गौरी-शंकर रुद्राक्ष सिर्फ जल्द विवाह ही नहीं करता बल्कि विवाहोपरान्त पति-पत्नी के बीच सुखमय स्थिति भी प्रदान करता है। "ॐ सुभगामै च विद्महे काममालायै धीमहि तन्नो गौरी प्रचोदयात्।।" ----"ॐ गौरी आवे शिव जी व्याहवे (अपना नाम) को विवाह तुरन्त सिद्ध करे, देर न करै, देर होय तो शिव जी का त्रिशूल पड़े। गुरु गोरखनाथ की दुहाई।।" उक्त मन्त्र की ११ दिन तक लगातार १ माला रोज जप करें। दीपक और धूप जलाकर ११वें दिन एक मिट्टी के कुल्हड़ का मुंह लाल कपड़े में बांध दें। उस कुल्हड़ पर बाहर की तरफ ७ रोली की बिंदी बनाकर अपने आगे रखें और ऊपर दिये गये मन्त्र की ५ माला जप करें। चुपचाप कुल्हड़ को रात के समय किसी चौराहे पर रख आवें। पीछे मुड़कर न देखें। सारी रुकावट दूर होकर शीघ्र विवाह हो जाता है। ---जिस लड़की के विवाह में बाधा हो उसे मकान के वायव्य दिशा में सोना चाहिए। ----लड़की के पिता जब जब लड़के वाले के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें तो लड़की अपनी चोटी खुली रखे। जब तक पिता लौटकर घर न आ जाए तब तक चोटी नहीं बाँधनी चाहिए। ----लड़की गुरुवार को अपने तकिए के नीचे हल्दी की गांठ पीले वस्त्र में लपेट कर रखे। ---पीपल की जड़ में लगातार १३ दिन लड़की या लड़का जल चढ़ाए तो शादी की रुकावट दूर हो जाती है। ---विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब हो और जातिकाएँ अपने अहं के कारण अनेल युवकों की स्वीकृति के बाद भी उन्हें अस्वीकार करती रहें तो उसे निम्न मन्त्र का १०८ बार जप प्रत्येक दिन किसी शुभ मुहूर्त्त से प्रारम्भ करके करना चाहिए--- "सिन्दूरपत्रं रजिकामदेहं दिव्ताम्बरं सिन्धुसमोहितांगम् सान्ध्यारुणं धनुः पंकजपुष्पबाणं पंचायुधं भुवन मोहन मोक्षणार्थम क्लैं मन्यथाम। महाविष्णुस्वरुपाय महाविष्णु पुत्राय महापुरुषाय पतिसुखं मे शीघ्रं देहि देहि।।" ----ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की किसी भी लड़के या लड़की को विवाह में बाधा आ रही हो यो विघ्नकर्ता गणेशजी की उपासना किसी भी चतुर्थी से प्रारम्भ करके अगले चतुर्थी तक एक मास करना चाहिए। इसके लिए स्फटिक, पारद या पीतल से बने गणेशजी की मूर्ति प्राण-प्रतिष्टित, कांसा की थाली में पश्चिमाभिमुख स्थापित करके स्वयं पूर्व की ओर मुँह करके जल, चन्दन, अक्षत, फूल, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करके १०८ बार "ॐ गं गणेशाय नमः" मन्त्र पढ़ते हुए गणेश जी पर १०८ दूर्वा चढ़ायें एवं नैवेद्य में मोतीचूर के दो लड्डू चढ़ायें। पूजा के बाद लड्डू बच्चों में बांट दें। यह प्रयोग एक मास करना चाहिए। गणेशजी पर चढ़ये गये दूर्वा लड़की के पिता अपने जेब में दायीं तरफ लेकर लड़के के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें। ---- तुलसी के पौधे की १२ परिक्रमायें तथा अनन्तर दाहिने हाथ से दुग्ध और बायें हाथ से जलधारा तथा सूर्य को बारह बार इस मन्त्र से अर्ध्य दें---- "ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्त्र किरणाय मम वांछित देहि-देहि स्वाहा।" फिर इस मन्त्र का १०८ बार जप करें- "ॐ देवेन्द्राणि नमस्तुभ्यं देवेन्द्र प्रिय यामिनि। विवाहं भाग्यमारोग्यं शीघ्रलाभं च देहि मे।" ----गुरुवार का व्रत करें एवं बृहस्पति मन्त्र के पाठ की एक माला आवृत्ति केला के पेड़ के नीचे बैठकर करें। -----कन्या का विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो तो एक लोटे में गंगाजल, थोड़ी-सी हल्दी, एक सिक्का डाल कर लड़की के सिर के ऊपर ७ बार घुमाकर उसके आगे फेंक दें। उसका वैवाहिक जीवन सुखी रहेगा। -----जो माता-पिता यह सोचते हैं कि उनकी पुत्रवधु सुन्दर, सुशील एवं होशियार हो तो उसके लिए वीरवार एवं रविवार के दिन अपने पुत्र के नाखून काटकर रसोई की आग में जला दें। -----विवाह में बाधाएँ आ रही हो तो गुरुवार से प्रारम्भ कर २१ दिन तक प्रतिदिन निम्न मन्त्र का जप १०८ बार करें- "मरवानो हाथी जर्द अम्बारी। उस पर बैठी कमाल खां की सवारी। कमाल खां मुगल पठान। बैठ चबूतरे पढ़े कुरान। हजार काम दुनिया का करे एक काम मेरा कर। न करे तो तीन लाख पैंतीस हजार पैगम्बरों की दुहाई।"
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01-01-1970 Blog

जानिए वसंत (बसंत) पंचमी 22 जनवरी 2018 पर कुछ विशेष...

जानिए वसंत (बसंत) पंचमी 22 जनवरी 2018 पर कुछ विशेष... प्रिय पाठकों/मित्रों, हमारे देश भारत में वसंत पंचमी को अबुझ मुहूर्त माना जाता है अर्थात बिना पंचांग देखे ही कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ कर सकते है। ज्योतिष में पांचवी राशि के अधिष्ठाता भगवान सूर्यनारायण होते है। इसलिए वसंत पंचमी अज्ञान का नाश करके प्रकाश की ओर ले जाती है। इसलिए सभी कार्य इस दिन शुभ होते है। वसन्त पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती जी की पूजा की जाती है। इसे पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और और कई राज्यों में बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन स्त्रियां पीले वस्त्र पहनती है। प्राचीन भारत और नेपाल में पुरे साल को जिन छः मौसमों में बांटा जाता है उनमे सबसे मनचाहा मौसम बसंत ही था। इस मौसम में फूल खिलने लगते है, खेतों में सरसो लहलहा उठती है, जाऊ और गेहूं की बालियां खिलने लगती है, आमों के पेड़ पर बौछारें आ जाती है और हर तरफ रंग बिरंगी तितलियाँ मजंदराने लगती है। वसंत ऋतू का स्वागत करने के लिए पांचवे दिन बड़ा उत्सव मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और कामदेव की पूजा की जाती है। इसके साथ ही इस दिन विद्यार्थी अपनी आराध्य यानी देवी सरस्वती का पूजन करते है। वसंत ऋतु हमारे जीवन में एक अद्भुत शक्ति लेकर आती है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इसी ऋतु में ही पुराने वर्ष का अंत होता है और नए वर्ष की शुरुआत होती है। इस ऋतु के आते ही चारों तरफ हरियाली छाने लगती है। सभी पेड़ों में नए पत्ते आने लगते हैं। आम के पेड़ बौरों से लद जाते हैं और खेत सरसों के फूलों से भरे पीले दिखाई देते हैं, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं हैं और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं हैं। इसी स्वाभाव के कारन इस ऋतु को ऋतुराज कहा गया है। इस ऋतु का स्वागत बसंत पंचमी या श्रीपंचमी के उत्सव से किया जाता हैं। ====================================================================== क्या है पीले रंग में रंगने का राज ? जानिए क्यों पहने जाते हैं पीले रंग के कपड़े ? पीला रंग हिन्दुओं का शुभ रंग होता है। बसंत ऋतु के आरंभ में हर ओर पीलाही रंग नजर आता है। बसंत पंचमी के दिन पीले रंग के चावल बनाये जाते है। पीले लड्डू और केसरयुक्त खीर बनायीं आती है। खेतों में सरसों के फूल पीले रंग को प्रदर्शित करते हैं। हल्दी व चन्दन का तिलक लगे जाता है। सभी लोग ज्यादातर पीले रंग के ही कपड़े पहनते हैं। ======================================================================= क्या हैं बसंत पंचमी का महत्त्व - बसंत का उत्सव प्रकृति का उत्सव है। माघ महीने की शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी होती है तथा इसी दिन से बसंत ऋतु की शुरुआत होती है। इस बार यह तिथि 22 जनवरी 2018 (सोमवार) को बनती है। बसंत का अर्थ अहि वसंत ऋतू और पंचमी का अर्थ है शुक्ल पक्ष का पांचवां दिन। वसंत पंचमी या श्रीपंचमी यह पूजा पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है। जिस प्रकार मनुष्य जीवन में यौवन आता है उसी प्रकार बसंत इस सृष्टि का यौवन है। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में 'ऋतूनां कुसुमाकरः' कहकर ऋतुराज बसंत को अपनी विभूति माना है। पंडित दयानन्द शास्त्री ने वसंत पंचमी के बारे में बताया कि इस दिन विद्यार्थी, शिक्षक एवं अन्य सभी देवी सरस्वती का पूजन करें। गरीब छात्रों को पुस्तक, पेन, आदि विद्या उपयोगी वस्तु का दान करें। सरस्वती मंत्र का जाप करें कई स्थानों पर सामूहिक सरस्वती पूजन के भी आयोजन होते है। इस दिन शक्तियों के पुनर्जागरण होता है। बसंत पंचमी के दिन सबसे अधिक विवाह होते एवं इस दिन गृह प्रवेश, वाहन क्रय, भवन निर्माण प्रारंभ, विद्यारंभ ग्रहण करना, अनुबंध करना, आभुषण क्रय करना व अन्य कोई भी शुभ एवं मांगलिक कार्य सफल होते है। इस वर्ष 2018 में वसंत पंचमी / सरस्वती पूजा 22 जनवरी 2018, सोमवार के दिन मनाई जाएगी। आइये जाने वसंत पंचमी 2018 पर सरस्वती पूजा का शुभ मुहूर्त :- वसंत पंचमी पूजा मुहूर्त = 07:17 मुहूर्त की अवधि = 5 घंटे 15 मिनट पंचमी तिथि = 21 जनवरी 2018, रविवार को 15:33 बजे प्रारंभ होगी। पंचमी तिथि = 22 जनवरी 2018, सोमवार को 16:24 बजे समाप्त होगी। बसंत पंचमी माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाई जाती है। आज ही के दिन से भारत में वसंत ऋतु का आरम्भ होता है। इस दिन सरस्वती पूजा भी की जाती है। बसंत पंचमी की पूजा सूर्योदय के बाद और दिन के मध्य भाग से पहले की जाती है। इस समय को पूर्वाह्न भी कहा जाता है। यदि पंचमी तिथि दिन के मध्य के बाद शुरू हो रही है तो ऐसी स्थिति में वसंत पंचमी की पूजा अगले दिन की जाएगी। हालाँकि यह पूजा अगले दिन उसी स्थिति में होगी जब तिथि का प्रारंभ पहले दिन के मध्य से पहले नहीं हो रहा हो; यानि कि पंचमी तिथि पूर्वाह्नव्यापिनी न हो। बाक़ी सभी परिस्थितियों में पूजा पहले दिन ही होगी। इसी वजह से कभी-कभी पंचांग के अनुसार बसन्त पंचमी चतुर्थी तिथि को भी पड़ जाती है। =============================================================================== आइये जान लेते हैं वसंत पंचमी या श्रीपंचमी से जुड़े कुछ पौराणिक और ऐतिहासिक तथ्य :- =========================================================================== पौराणिक इतिहास----- कैसे हुआ देवी सरस्वती का जन्म ? क्यों की जाती है देवी सरस्वती की पूजा ? कहा जाता है जब ब्रह्मा जी ने भगवान् विष्णु की आज्ञा पाकर सृष्टि की रचना की तब चारों ओर शांति ही शांति थी। किसी भी प्रकार की कोई ध्वनि नहीं थी। विष्णु और ब्रह्मा जी को ये रचना कुछ अधूरी प्रतीत हुयी। उस समय ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से पृथ्वी पर जल छिड़का। जल छिड़कने के बाद वृक्षों के बीच एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुयी। जिन्हें हम देवी सरस्वती के नाम से जानते हैं। जिसके 4 हाथ थे। एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा जी के अनुरोध पर जैसे ही देवी सरस्वती ने वीणा बजायी सारे संसार को वाणी की प्राप्ति हो गयी। इसी कारन ब्रह्मा जी ने देवी सरस्वती को देवी की वाणी कहा। ये सब बसंत पंचमी के दिन ही हुआ था। विद्या की देवी सरस्वती से ही हमें बुद्धि व ज्ञान की प्राप्ति होती है। हमारी चेतना का आधार देवी सरस्वती को ही माना जाता है। संगीत की उत्पत्ति करने वाली देवी सरस्वती को संगीत की देवी भी कहा जाता है। इन सब कारणों के अलावा देवी सरस्वती की पूजा का एक कारण यह भी मन जाता है कि भगवान् विष्णु ने भी देवी सरस्वती से प्रसन्न होकर उन्हें ये वरदान दिया था कि बसंत पंचमी के दिन उनकी पूजा की जायेगी। सबसे पहले श्रीकृष्ण ने देवी सरस्वती का पूजन माघ शुक्ल पंचमी को किया था, तब से बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजन का प्रचलन है। फलस्वरूप आज भारत के एक बड़े हिस्से में देवी सरस्वती की आराधना बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से होती है। ============================================================================= यह हैं ऐतिहासिक तथ्य-- मुहम्मद गौरी का अंत था-- पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी के युद्ध के बारे में शायद ही कोई ना जानता हो। लेकिन क्या आपको पता है कि पृथ्वीराज चौहान ने 16 बार मुहम्मद गौरी को युद्ध में हराया था और उस पर दया कर उसे जीवनदान दे दिया था। इसके बाद भी मुहम्मद गौरी ने अपनी नीचता का त्याग न करते हुए 17वीं बार फिर हमला किया और पृथ्वीराज चौहान व उनके साथी कवी चंदरबरदाई को कैद कर पाने साथ अफ़ग़ानिस्तान ले गया। वहां उसने पृथ्वीराज चौहान की आँखें फोड़ दीं। मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को मृत्युदंड दिया। किन्तु उस से पहले उसने पृथ्वीराज चौहान की शब्दभेदी बाण चलाने की कला को देखने की इच्छा जताई। उसके बाद जो हुआ उस से कोई भी अनजान नहीं है। पृथ्वीराज चौहान ने मौके का फ़ायदा उठाया और साथी कवी चंदरबरदाई के इस संकेत :- चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण। ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान ॥ को पाकर जरा भी देर न की और बाण सीधा मुहम्मद गौरी के सीने में उतार दिया। और फिर दोनों ने एक दूसरे के पेट में छूरा घोंप कर अपना बलिदान दे दिया। यह घटना भी बसंत पंचमी के दिन की ही है। ================================================================================ आइये क्या करें इस वसन्त पंचमी पर -- पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आज के दिन देवी रति और भगवान कामदेव की षोडशोपचार पूजा करने का भी विधान है। षोडशोपचार पूजा संकल्प-- ॐ विष्णुः विष्णुः विष्णुः, अद्य ब्रह्मणो वयसः परार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे, अमुकनामसंवत्सरे माघशुक्लपञ्चम्याम् अमुकवासरे अमुकगोत्रः अमुकनामाहं सकलपाप - क्षयपूर्वक - श्रुति - स्मृत्युक्ताखिल - पुण्यफलोपलब्धये सौभाग्य - सुस्वास्थ्यलाभाय अविहित - काम - रति - प्रवृत्तिरोधाय मम पत्यौ/पत्न्यां आजीवन - नवनवानुरागाय रति - कामदम्पती षोडशोपचारैः पूजयिष्ये। यदि बसन्त पंचमी के दिन पति-पत्नी भगवान कामदेव और देवी रति की पूजा षोडशोपचार करते हैं तो उनकी वैवाहिक जीवन में अपार ख़ुशियाँ आती हैं और रिश्ते मज़बूत होते हैं। =========================================================================== करें रति और कामदेव का ध्यान--- ॐ वारणे मदनं बाण - पाशांकुशशरासनान्। धारयन्तं जपारक्तं ध्यायेद्रक्त - विभूषणम्।। सव्येन पतिमाश्लिष्य वामेनोत्पल - धारिणीम्। पाणिना रमणांकस्थां रतिं सम्यग् विचिन्तयेत्।। ====================================================================== कला और शिक्षा हेतु करें सरस्वती पूजा-- आज के दिन ऊपर दिए गए मुहूर्त के अनुसार साहित्य, शिक्षा, कला इत्यादि के क्षेत्र से जुड़े लोग विद्या की देवी सरस्वती की पूजा-आराधना करते हैं। देवी सरस्वती की पूजा के साथ यदि सरस्वती स्त्रोत भी पढ़ा जाए तो अद्भुत परिणाम प्राप्त होते हैं और देवी प्रसन्न होती हैं। यह हैं सरस्वती मंत्र:--- ऊं ऐं सरस्वत्यै नमः ========================================================================== श्री पंचमी-- आज के दिन धन की देवी 'लक्ष्मी' (जिन्हें "श्री" भी कहा गया है) और भगवान विष्णु की भी पूजा की जाती है। कुछ लोग देवी लक्ष्मी और देवी सरस्वती की पूजा एक साथ ही करते हैं। सामान्यतः क़ारोबारी या व्यवसायी वर्ग के लोग देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। लक्ष्मी जी की पूजा के साथ श्री सू्क्त का पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना गया है। ऊपर दी गईं सभी पूजाएँ पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से करनी चाहिए। एक बात जो आपको हमेशा याद रखनी है वह यह कि पंचमी तिथि उसी दिन मानी जाएगी जब वह पूर्वाह्नव्यापिनी होगी; यानि कि सूर्योदय और दिन के मध्य भाग के बीच में प्रारंभ होगी। ================================================================================= जानिए वसंत पंचमी की विशेषताएं... - माघ माह:-इस महिने को भगवान विष्णु का स्वरूप बताया है। - शुक्ल पक्ष:-इस समय चन्द्रमा अत्यंत प्रबल रहता है। - गुप्त नवरात्रीः-सिद्धी,साधना,गुप्त साधनाके लिए मुख्य समय - उत्तरायण सूर्यः-देवताओं का दिन इस समय सूर्य देव पृथ्वी के निकट रहते है। - वसंत ऋतु:-समस्त ऋतुओं की राजा इसे ऋतुराज वसंत कहते है यह सृष्टि का यौवनकाल होता है। - सरस्वती जयंतीः ब्रह्मपुराण के अनुसार देवी सरस्वती इस दिन ब्रह्माजी के मानस से अवतीर्ण हुई थी। ============================================================
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01-01-1970 Blog

आइये जाने और समझे क्या ओर क्यों करें इस मौनी अमावस्या(16 जनवरी 2018) पर-

आइये जाने और समझे क्या ओर क्यों करें इस मौनी अमावस्या(16 जनवरी 2018) पर---- प्रिय पाठकों/मित्रों, मौनी अमावस्या पर बन रहे विशेष योग में बरतें सावधानी, ये उपाय बनाएंगे धनयोग--- आज /इस मंगलवार (16 जनवरी 2018 )को मौनी अमावस्या तिथि पड़ रही है। यह रहेगा मौनी अमावस्या 2018 शुभ मुहूर्त-- पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस मौनी अमावस्या का आरंभ सुबह 5 बजकर 11 मिनट पर हो रहा है जो 17 जनवरी को सुबह 7 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। इसलिए सूर्योदय के बाद से ही पूरे दिन स्नान दान का शुभ मुहूर्त है। अमावस्या और मंगलवार के संयोग से ये भौमवती अमावस्या कहलाती है। इस दिन किए गए उपाय अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक फल देते हैं। तंत्र शास्त्र में इस दिन को खास महत्व दिया जाता है। अमावस्या को सूर्य और चन्द्र का मिलन होता है और दोनों एक ही राशि में प्रवेश करते हैं। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ज्योतिष की दृष्टि से चन्द्रमा को मन का कारक देव माना जाता है। अमावस्या की रात चन्द्रमा लुप्त हो जाता है। जिन जातको की नकारात्मक विचारधारा होती है ऐसे जातको पर नकारात्मक शक्तियां अपना प्रभाव जल्दी डालती हैं। ज्योतिषशास्त्र और धर्म की दृष्टि से यह बहुत ही अद्भुत संयोग माना जा रहा है। धर्म ग्रंथों में इसे मौनी अमावस्या कहा गया है। मौनी शब्द मौन से बना है इसलिए अपने नाम के अनुसार इस अमावस्या तिथि में सुबह बिना कुछ भी बोले स्नान करना होता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार इस साल माघ के महीने में मंगलवार के दिन मौनी अमावस्या का होना इसलिए भी शुभ माना जा रहा है कि इससे भौमवती अमावस्या का भी संयोग बन गया है। इससे मंगल से संबंधित ग्रह दोषों को भी दूर किया जा सकता है। शास्त्रों में बताया गया है कि इस अमावस्या के संयोग में गंगा स्नान, जप, तप, ध्यान, तर्पण एवं दान करने से एक हजार गाय दान करने का पुण्यफल प्राप्त होता है। जो लोग गंगा स्नान नहीं कर पाते हैं वह अपने घर में ही जल में गंगाजल मिलाकर भी स्नान करें और (गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावेरि जलऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ।।) इस मंत्र को बोलते हुए स्नान करें तो त्रिवेणी स्नान का पुण्य प्राप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन मौन रखना, गंगा स्नान करना और दान देने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। पितरों से संबंधित सभी श्राद्ध-तर्पण आदि कार्य अमावस्या तक और अनुष्ठान या बड़े यज्ञ आदि कार्य शुक्लपक्ष की पूर्णिमा तक किए जाते हैं। इन सभी युतियों में माघ माह में सूर्य एवं चन्द्र का मिलन सर्वश्रेष्ठ माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इस दौरान सभी देवी देवता प्रयाग तीर्थ में इकट्ठे होते हैं माघ की अमावस्या के दिन यहां पितृलोक के सभी पितृदेव भी आते हैं। अतः यह दिन पृथ्वी पर देवों एवं पितरों के संगम के रूप में मनाया जाता हैं। इस अमावस्या के विषय में कहा गया है कि इस दिन मन, कर्म, तथा वाणी के जरिए किसी के लिए अशुभ नहीं सोचना चाहिए। केवल बंद होठों से उपांशु क्रिया के जरिए ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, ॐ खखोल्काय नमः ॐ नमः शिवाय मंत्र पढ़ते हुए अर्घ्य आदि देना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि समुद्र मंथन में प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में जहां-जहां भी अमृत की बूंदें गिरी थीं उन-उन स्थानों पर यदि मौनी अमावस्या के दिन जप-तप, स्नान आदि किया जाए तो और भी पुण्यप्रद होता है। सतयुग में में तप से, द्वापर में श्रीहरि की भक्ति से, त्रेता में ब्रह्मज्ञान और कलियुग में दान से मिले हुए पुण्य के बराबर माघ मास की मौनी अमावस्या में केवल किसी भी संगम में स्नान दान से भी उतना ही पुण्य मिल जाता है। इस दिन स्नान के बाद अपने सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, धन आदि का दान देना चाहिए। इस दिन तिल दान भी उत्तम कहा गया है। अमा‍वस्या की रात भूत-प्रेत, पितृ, पिशाच, निशाचर जीव-जंतु और दैत्यों की रात मानी जाती है क्योंकि इस रात में यह शक्तियां अधिक सक्रिय और बलवान हो जाती हैं। अमावस्या की रात विशेष सावधानी रखें। मोनी अमावस्या के दिन किए गए ये अचूक उपाय आपको देंगे हर समस्या से निजात और बनाएंगे धनयोग। पितरों की प्रसन्नता के लिए जनेऊधारी ब्राह्मण को भोजन खिलाएं, पितर कृपा से बनेंगे अमीर। धन लाभ हेतु देवी लक्ष्मी के सामने घी का दीपक जलाकर कमल गट्टे की माला से इस मंत्र का ग्यारह माला जाप करें- मंत्र- सिद्धि बुद्धि प्रदे देवि भुक्ति मुक्ति प्रदायिनी। मंत्र पुते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते।। किसी भी इच्छा की पूर्ति के लिए शिवलिंग पर पंचामृत व बिल्वपत्र चढ़ाएं, दीपदान करें। रुद्राक्ष की माला से ऊं नमः शिवायः मंत्र का अधिक से अधिक जाप करें। मछलियों को आटे की गोलियां खिलाने से समस्त परेशानियों का नाश होता है। पापों का प्रायश्चित करने के लिए चीटियों को शक्कर मिला कर आटा खिलाएं। शाम को गाय के घी का दीपक घर के ईशान कोण में जलाएं और दीपक में रूई की जगह पर लाल रंग के धागे का उपयोग करें और दीपक में थोड़ा केसर भी डालें। आइये जाने की ओर क्या करना चाहिए मौनी अमावस्या पर --- * माघ मास में पवित्र नदियों में स्नान करने से एक विशेष ऊर्जा प्राप्त होती है। * अमावस्या के दिन जप-तप, ध्यान-पूजन करने से विशेष धर्मलाभ प्राप्त होता है। * मौनी अमावस्या के दिन मौन रहकर आचरण तथा स्नान-दान करने का विशेष महत्व है। * शास्त्रों में वर्णित है कि माघ मास में पूजन-अर्चन व नदी स्नान करने से भगवान नारायण को प्राप्त किया जा सकता है तथा इन दिनों नदी में स्नान करने से स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग मिल जाता है। * जो लोग घर पर स्नान करके अनुष्ठान करना चाहते हैं, उन्हें पानी में थोड़ा-सा गंगाजल मिलाकर तीर्थों का आह्वान करते हुए स्नान करना चाहिए। * इस दिन सूर्यनारायण को अर्घ्य देने से गरीबी और दरिद्रता दूर होती है। * जिन लोगों का चंद्रमा कमजोर है, वह गाय को दही और चावल खिलाएं तो मानसिक शांति प्राप्त होगी।
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गुप्त नवरात्रि 2018

प्रिय पाठकों/मित्रों, हमारे वेदों, पुराणों एवं शास्त्रों के अनुसार माघ माह के शुक्ल पक्ष में गुप्त नवरात्रि मनाई जाती है तदानुसार इस वर्ष गुरुवार 18 जनवरी 2018 से गुप्त नवरात्रि प्रारम्भ होगी. ये नवरात्रि अन्य नवरात्रि की तरह नौ दिन मनाई जाती है अतः इस वर्ष गुप्त नवरात्रि 18 जनवरी से 25 जनवरी तक मनाई जाएगी । हिन्दू धर्म में माँ दुर्गा की साधना के लिए नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है । पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि नवरात्रि के दौरान साधक विभिन्न साधनो द्वारा माँ भगवती की विशेष पूजा करते है तथा नवरात्रि के ही समय में कुछ भक्त तंत्र विद्या सीखते है जिसे गुप्त नवरात्रि के नाम से जाना जाता है। गुप्त नवरात्रि तंत्र साधना के लिए अति विशेष माना जाता है। जिसमें तंत्र सिखने वाले भक्त गण अपनी पूजा से माँ भगवती को प्रसन्न करते है। गुप्त नवरात्रि के सम्बन्ध में बहुत कम लोगो को जानकारी है। नवरात्र के नौ दिनों में मां के अलग-अलग रुपों की पूजा को शक्ति की पूजा के रुप में भी देखा जाता है। मां शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि मां के नौ अलग-अलग रुप हैं। नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना की जाती है। इसके बाद लगातार नौ दिनों तक मां की पूजा व उपवास किया जाता है। दसवें दिन कन्या पूजन के पश्चात उपवास खोला जाता है। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले नवरात्र गुप्त नवरात्र कहलाते हैं। हालांकि गुप्त नवरात्र को आमतौर पर नहीं मनाया जाता लेकिन तंत्र साधना करने वालों के लिये गुप्त नवरात्र बहुत ज्यादा मायने रखते हैं। तांत्रिकों द्वारा इस दौरान देवी मां की साधना की जाती है। नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना की जाती है। इसके बाद लगातार नौ दिनों तक मां की पूजा व उपवास किया जाता है। दसवें दिन कन्या पूजन के पश्चात उपवास खोला जाता है। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले नवरात्र गुप्त नवरात्र कहलाते हैं। हालांकि गुप्त नवरात्र को आमतौर पर नहीं मनाया जाता लेकिन तंत्र साधना करने वालों के लिये गुप्त नवरात्र बहुत ज्यादा मायने रखते हैं। तांत्रिकों द्वारा इस दौरान देवी मां की साधना की जाती है। माघ नवरात्र गुप्त नवरात्रों के नाम से भी जाने जाते हैं । माघ महीने यानी जनवरी या फरवरी माह में पड़ने के कारण इन नवरात्रों को माघ नवरात्र कहा जाता है । देश के अधिकतर भाग में माघ नवरात्रों के बारे में लोग नहीं जानते हैं । भारत में हिमाचल प्रदेश, पंजाब , हरयाणा, उत्तराखंड के आस पास के प्रदेशों में गुप्त नवरात्रों में माँ भगवती की पूजा की जाती है । माँ भगवती के सभी 9 रूपों की पूजा नवरात्रों के भिन्न – भिन्न दिन की जाती है , अतः आइये जानते हैं पण्डित दयानन्द शास्त्री से इन दिनों में किस देवी की पूजा कब की जानी चाहिए--- 18 जनवरी (बृहस्पतिवार) 2018 : घट स्थापन एवं माँ शैलपुत्री पूजा। 19 जनवरी (शुक्रवार ) 2018 : माँ ब्रह्मचारिणी पूजा। 20 जनवरी (शनिवार ) 2018 : माँ चंद्रघंटा पूजा। 21 जनवरी (रविवार ) 2018: माँ कुष्मांडा पूजा 22 जनवरी (सोमवार) 2018 : माँ स्कंदमाता पूजा । 23 जनवरी (मंगलवार ) 2018: माँ कात्यायनी पूजा । 24 जनवरी (बुधवार) 2018: माँ कालरात्रि पूजा । 25 जनवरी (बृहस्पतिवार )2018: दुर्गा अष्टमी एवं माँ महागौरी पूजा । 26 जनवरी (शुक्रवार ) 2018: माँ सिद्धिदात्री नवरात्री पारण । नवरात्रों में माँ भगवती की आराधना दुर्गा सप्तसती से की जाती है , परन्तु यदि समयाभाव है तो भगवान् शिव रचित सप्तश्लोकी दुर्गा का पाठ अत्यंत ही प्रभाव शाली एवं दुर्गा सप्तसती का सम्पूर्ण फल प्रदान करने वाला है । जानिए गुप्त नवरात्र पूजा विधि--- धर्मिक मान्यतानुसार गुप्त नवरात्रि में अन्य नवरात्रि की तरह पूजा करनी चाहिए। नवरात्रि नौ दिनों का पर्व होता है तथा जिसकी शुरुवात प्रथम दिन घट स्थापना से की जाती है। घट स्थापना के पश्चात नौ दिनों तक सुबह तथा शाम में माँ दुर्गा अर्थात भगवती की पूजा करनी चाहिए। अष्टमी या नवमी के दिन नवरात्रि का समापन कन्या-पूजन करने के पश्चात करना चाहिए। पण्डित दयानन्द शास्त्री के अनुसार आशादा नवरात्रि जिसे गुप्त नवरात्री या वरही नवरात्रि के रूप में भी जाना जाता है नौ दिवसीय वराही देवी को समर्पित उत्सव है। गुप्त नवरात्री के दिन तांत्रिकों और साधकों के लिए बहुत ही शुभ माने जाते है। उपवास रख कर और श्लोकों और मंत्रों का जप करके भक्त देवी के प्रति अपनी भक्ति को दर्शाते है। यह माना जाता है कि इस नवरात्री के दौरान देवी तुरंत भक्तों की प्रार्थनाओं पर ध्यान देती हैं और उनकी इच्छाओं को पूरा करती हैं। वराही देवी को तीन रूपों में पूजा की जाता है: दोषों को हटाने वाली धन और समृद्धि का उपहार देने वाली और ज्ञान की देवी। ये हैं गुप्त नवरात्री पूजा के लाभ:- गुप्त नवरात्री पूजा तांत्रिक पूजा के लिए भारत के कई हिस्सों में प्रसिद्ध है। यह शक्ति की प्राप्ति के लिए और धन समृधि और ज्ञान प्राप्त करने के लिए मनाई जाती है। देवी दुर्गा संकट के उन्मूलन के लिए जानी जाती है। देवी दुर्गा व्यथित लोगों के प्रति दया दिखाती है। इस नवरात्री में दुर्गा सप्तशती के पाठ को पड़ा जाता है। जानिए कैसे करें कलश स्थापन --- सनातन धर्म में कोई भी धार्मिक कार्य आरंभ करने से पूर्व कलश स्थापना करने का विधान है। पृथ्वी को कलश का रूप माना जाता है तत्पश्चात कलश में उल्लिखित देवी- देवताओं का आवाहन कर उन्हें विराजित किया जाता है। इससे कलश में सभी ग्रहों, नक्षत्रों एवं तीर्थों का निवास हो जाता है। पौरणिक मान्यता है की कलश स्थापना के उपरांत कोई भी शुभ काम करें वह देवी-देवताओं के आशीर्वाद से निश्चिंत रूप से सफल होता है। प्रथम गुप्त नवरात्रि में दुर्गा पूजा का आरंभ करने से पूर्व कलश स्थापना करने का विधान है। जिससे मां दुर्गा का पूजन बिना किसी विध्न के कुशलता पूर्वक संपन्न हो और मां अपनी कृपा बनाएं रखें। कलश स्थापना के उपरांत मां दुर्गा का श्री रूप या चित्रपट लाल रंग के पाटे पर सजाएं। फिर उनके बाएं ओर गौरी पुत्र श्री गणेश का श्री रूप या चित्रपट विराजित करें। पूजा स्थान की उत्तर-पूर्व दिशा में धरती माता पर सात तरह के अनाज, पवित्र नदी की रेत और जौं डालें। कलश में गंगाजल, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, रोली, मौली, चंदन, अक्षत, हल्दी, सिक्का, पुष्पादि डालें। आम, पीपल, बरगद, गूलर अथवा पाकर के पत्ते कलश के ऊपर सजाएं। जौ अथवा कच्चे चावल कटोरी में भरकर कलश के ऊपर रखें उसके बीच नए लाल कपड़े से लिपटा हुआ पानी वाला नारियल अपने मस्तक से लगा कर प्रणाम करते हुए रेत पर कलश विराजित करें। अखंड ज्योति प्रज्जवलित करें जो पूरे नौ दिनों तक जलती रहनी चाहिए। विधि-विधान से पूजन किए जानें से अधिक मां दुर्गा भावों से पूजन किए जाने पर अधिक प्रसन्न होती हैं। अगर आप मंत्रों से अनजान हैं तो केवल पूजन करते समय दुर्गा सप्तशती में दिए गए नवार्ण मंत्र 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे' से समस्त पूजन सामग्री अर्पित करें। मां शक्ति का यह मंत्र समर्थ है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूजन सामग्री लाएं और प्रेम भाव से पूजन करें। संभव हो तो श्रृंगार का सामान, नारियल और चुनरी अवश्य अर्पित करें। नौ दिन श्रद्धा भाव से ब्रह्म मुहूर्त में और संध्याकाल में सपरिवार आरती करें और अंत में क्षमा प्रार्थना अवश्य करें। कलश स्थापना के बाद हर रोज सुबह-शाम दुर्गा के मंत्रों का जाप, दुर्गा चालीसा या दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए। इसके अलावा संध्या के समय में आरती करना भी विशेष रूप से फलदायी रहता है। माना जाता है कि इस नवरात्रि में अपनी इच्छा और पूजा दोनों को ही गुप्त रूप से रखना होता है तभी वह सफल होती है। इस नवरात्रि के बारे में महाकाल संबिता और तमाम शाक्त ग्रंथों में बताया गया है। इनमें विशेष तरह की इच्छा पूर्ति और सिद्धि प्राप्त करने के लिए पूजा और अनुष्ठान किया जाता है। इन मंत्रों का करें जाप - 'ऊं ऐं हीं क्लीं चामुण्डाये विच्चे नम:' 'ऊं ऐं महाकालाये नम:' 'ऊं हीं महालक्ष्मये नम:' 'ऊं क्लीं महासरस्वतये नम:' गुप्त नवरात्रि के दौरान भूलकर भी न करें ये काम - भूलकर भी इन दिनों में नाखून न काटें। कन्याओं को अपना झूठा भोजन न दें। मांस, व्यसन आदि का पान न करें। बाल न कटवाएं और न हीं दाढ़ी बनवाएं। झूठ बोलने से बचें। किसी का अपमान न करें। यह हैं गुप्त नवरात्रि का महत्व--- गुप्त नवरात्रि शक्ति साधना, तांत्रिक क्रियाएँ, महाकाल आदि के लिए विशष महत्व रखती है। गुप्त नवरात्रि के दौरान साधक कठिन भक्ति नियम से व्रत तथा माँ दुर्गा की साधना करते है। माँ दुर्गा साधक के कठिन भक्ति और व्रत से दुर्लभ और अतुल्य शक्ति साधक को प्रदान करती है। इस तरह गुप्त नवरात्रि की कथा तथा महिमा सम्पन्न हुई। भक्त गण प्रेम से बोलिए माँ भगवती ओर माँ काली की जय।
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01-01-1970 Blog

जानिए वैवाहिक जीवन में तनाव के कारण (ज्योतिष एवं वास्तु दोष का आपके वैवाहिक जीवन पर प्रभाव)-

जानिए वैवाहिक जीवन में तनाव के कारण (ज्योतिष एवं वास्तु दोष का आपके वैवाहिक जीवन पर प्रभाव)--- प्रिय पाठकों/मित्रों, विवाह हमारे पारम्परिक सोलह संस्कारों में से एक है, जीवन के एक पड़ाव को पार करके किशोरावस्था से युवास्था में प्रवेश करने के बाद व्यक्ति को जीवन यापन और सामाजिक ढांचे में ढलने के लिए एक अच्छे जीवन साथी की आवश्यकता होती है और जीवन की पूर्णता के लिए यह आवश्यक भी है परन्तु हमारे जीवन में सभी चीजें सही स्थिति और सही समय पर हमें प्राप्त हो ऐसा आवश्यक नहीं है इसमें आपके भाग्य की पूरी भूमिका होती है और जन्मकुंडली इसी भाग्य का प्रतिरूप होती है जहाँ बहुत से लोगो का वैवाहिक जीवन शांति और सुखमय व्यतीत होता है वहीं बहुत बार देखने को मिलता है के व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में हमेशा तनाव और संघर्ष की स्थिति बनी रहती है आपस में वाद विवाद या किसी ना किसी बात को लेकर वैवाहिक जीवन में उतार चढ़ाव की स्थिती बनी ही रहती है ऐसा वास्तव में व्यक्ति की जन्मकुंडली में बने कुछ विशेष ग्रह योगों के कारण ही होता है आईये इसे ज्योतिषीय दृष्टिकोण से जानते हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की विवाह संस्कार भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण संस्कार है। यह मनुष्य को परमात्मा का एक वरदान है। कहते हैं, जोड़ियां परमात्मा द्वारा पहले से ही तय होती हैं। पूर्व जन्म में किए गए पाप एवं पुण्य कर्मों के अनुसार ही जीवन साथी मिलता है और उन्हीं के अनुरूप वैवाहिक जीवन दुखमय या सुखमय होता है। कुंडली में विवाह का विचार मुखयतः सप्तम भाव से ही किया जाता है। इस भाव से विवाह के अलावा वैवाहिक या दाम्पत्य जीवन के सुख-दुख, जीवन साथी अर्थात पति एवं पत्नी, काम (भोग विलास), विवाह से पूर्व एवं पश्चात यौन संबंध, साझेदारी आदि का विचार किया जाता है। यदि कोई भाव, उसका स्वामी तथा उसका कारक पाप ग्रहों के मध्य में स्थित हों, प्रबल पापी ग्रहों से युक्त हों, निर्बल हों, शुभग्रह न उनसे युत हों न उन्हें देखते हों, इन तीनों से नवम, चतुर्थ, अष्टम, पंचम तथा द्वादश स्थानों में पाप ग्रह हों, भाव नवांश, भावेश नवांश तथा भाव कारक नवांश के स्वामी भी शत्रु राशि में, नीच राशि में अस्त अथवा युद्ध में पराजित हों तो उस भाव से संबंधित वस्तुओं की हानि होती है। (उत्तर कालामृत) वैवाहिक जीवन के अशुभ योग यदि सप्तमेश शुभ युक्त न होकर षष्ठ, अष्टम या द्वादश भावस्थ हो और नीच या अस्त हो, तो जातक या जातका के विवाह में बाधा आती है। यदि षष्ठेश, अष्टमेश या द्वादशेश सप्तम भाव में विराजमान हो, उस पर किसी ग्रह की शुभ दृष्टि न हो या किसी ग्रह से उसका शुभ योग न हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा आती है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यदि सप्तम भाव में क्रूर ग्रह हो, सप्तमेश पर क्रूर ग्रह की दृष्टि हो तथा द्वादश भाव में भी क्रूर ग्रह हो, तो वैवाहिक सुख में बाधा आती है। सप्तमेश व कारक शुक्र बलवान हो, तो जातक को वियोग दुख भोगना पड़ता है। यदि शुक्र सप्तमेश हो (मेष या वृश्चिक लग्न) और पाप ग्रहों के साथ अथवा उनसे दृष्ट हो, या शुक्र नीच व शत्रु नवांश का या षष्ठांश में हो, तो जातक स्त्री कठोर चित्त वाली, कुमार्गगामिनी और कुलटा होती है। फलतः उसका वैवाहिक जीवन नारकीय हो जाता है। यदि शनि सप्तमेश हो, पाप ग्रहों क साथ व नीच नवांश में हो अथवा नीच राशिस्थ हो और पाप ग्रहों से दृष्ट हो, तो जीवन साथी के दुष्ट स्वभाव के कारण वैवाहिक जीवन क्लेशमय होता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण में हमारी कुंडली का "सप्तम भाव" विवाह का भाव होता है अतः हमारे जीवन में विवाह, वैवाहिक जीवन, पति, पत्नी आदि का सुख सप्तम भाव और सप्तमेश (सातवें भाव का स्वामी) की स्थिति पर निर्भर करता है। इसके आलावा पुरुषों की कुंडली में "शुक्र" विवाह, वैवाहिक जीवन और पत्नी का नैसर्गिक कारक होता है तथा स्त्री की कुंडली में विवाह, वैवाहिक जीवन और पति सुख को "मंगल" और "बृहस्पति" नियंत्रित करते हैं अतः जब किसी व्यक्ति की कुंडली में वैवाहिक जीवन को नियंत्रित करने वाले ये घटक कमजोर या पीड़ित स्थिति में हो तो वैवाहिक जीवन में बार बार तनाव, वाद–विवाद या उतार चढ़ाव की स्थिति बनती है। हर घर की यही कहानी है कि पहले जो दो लोग आपस में एक दूसरे से इतना प्रेम करते थे वही आज छोटी-छोटी बात पर आपस में झगड़ते हैं. कभी-कभी तो झगड़ा इतना बढ़ जाता है कि कई दिन तक एक दूसरे कि शक्ल तक नहीं देखते. शादी में बेवफाई का क्या कारण है। हाल ही में एक रिसर्च के अनुसार 10 प्रतिशत तलाक पार्टनर की बेवफाई के कारण होते हैं। पति-पत्नी इस कारण से अपने रास्ते अलग-अलग कर लेते हैं यह स्वाभाविक है लेकिन बहुत से लोगों का रिश्ता इसलिए खराब हो जाता है क्यों कि वे एक दूसरे को धोखा देते हैं। यह काफी चौकाने वाला लगे लेकिन ये सच है बहुत से असंतुष्ट पार्टनर अपने साथी से अलग होने से पहले उसको धोखा देते हैं। पुरुषों का धोखा देना और महिलाओं का धोखा देना अलग-अलग तरह का होता है। कुछ पुरुष तो इस रिश्ते के अलावा बाहर मजे लेने के लिए ही अपनी पत्नी को धोखा देते हैं। कुछ पुरुष जब तक परेशानी में नहीं पड़ते तब तक शर्म महसूस नहीं करते हैं। जहां तक महिलाओं का सवाल है वे अपने साथी को खास तौर पर धोखा तब देती हैं जब वे अपने आपको रिश्ते में भावनात्मक रूप से अकेला पाती हैं। स्त्री-पुरुषों में धोखा देने का तरीका और आदत अलग-अलग हो सकती हैं लेकिन धोखा देने के पीछे उद्देश्य लगभग एक जैसा ही होता है। ====================================================================== जानिए किन विशेष ग्रहयोग के कारण होता हैं वैवाहिक जीवन में संघर्ष--– यदि कुंडली के सप्तम भाव में कोई पाप योग (गुरु–चांडाल योग, ग्रहण योग अंगारक योग आदि) बना हुआ हो तो वैवाहिक जीवन में तनाव और बाधाएं उपस्थित होती हैं। यदि सप्तम भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में बैठा हो तो वैवाहिक जीवन में संघर्ष की स्थिति बनती है। राहु–केतु का सप्तम भाव में शत्रु राशि में होना भी वैवाहिक जीवन में तनाव का कारण बनता है। यदि सप्तम भाव के आगे और पीछे दोनों और और पाप ग्रह हो तो यह भी वैवाहिक जीवन में बाधायें उत्पन्न करता है। सप्तमेश का पाप भाव (6,8,12) में बैठना या नीच राशि में होना भी वैवाहिक जीवन में उतार चढ़ाव का कारण बनता है। पुरुष की कुंडली में शुक्र नीच राशि (कन्या) में हो, केतु के साथ हो, सूर्य से अस्त हो, अष्टम भाव में हो या अन्य किसी प्रकार पीड़ित हो तो वैवाहिक जीवन में तनाव और संघर्ष उत्पन्न होता है। स्त्री की कुंडली में मंगल नीच राशि (कर्क) में हो, राहु शनि से पीड़ित हो बृहस्पति नीचस्थ हो राहु से पीड़ित हो तो वैवाहिक जीवन में बाधायें और वाद विवाद उत्पन्न होते हैं। पाप भाव (6,8,12) के स्वामी यदि सप्तम भाव में हो तो भी वैवाहिक जीवन में विलम्ब और बाधाएं आती हैं। सप्तम में शत्रु राशि या नीच राशि (तुला) में बैठा सूर्य भी वैवाहिक जीवन में बाधायें और संघर्ष देता है। विशेष – यदि पीड़ित सप्तमेश, सप्तम भाव, शुक्र और मंगल पर बृहस्पति की शुभ दृष्टि पड़ रही हो तो ऐसे में वैवाहिक जीवन की समस्याएं अधिक बड़ा रूप नहीं लेती और उनका कोई ना कोई समाधान व्यक्ति को मिल जाता है, वैवाहिक जीवन की समस्यायें अधिक नकारात्मक स्थिति में तभी होती हैं जब कुंडली में वैवाहिक जीवन के सभी घटक पीड़ित और कमजोर हो और शुभ प्रभाव से वंछित हों। ============================================================================= ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की कभी-कभी किसी जन्मकुंडली में द्विविवाह योग होता है, जिसके फलस्वरूप जातक या जातका का वैवाहिक जीवन कष्टमय हो जाता है। ऐसे में दोनों को पुनः छोटे से रूप में पंडित से विवाह रस्म करवाना चाहिए। विवाह शुभ मुहूर्त या लग्न में ही करना चाहिए, अन्यथा दाम्पत्य जीवन के कलहपूर्ण होने की प्रबल संभावना रहती है। यदि ऐसा नहीं हुआ हो अर्थात यदि विवाह शुभ मुहूर्त या शुभ लग्न में नहीं हुआ हो, तो विवाह की तिथि व समय का विद्वान ज्योतिषाचार्य से विश्लेषण करवाना चाहिए और शुभ मुहूर्त या लग्न में पुनः विवाह करना चाहिए। पारिवारिक सुख की प्राप्ति हेतु यदि पति-पत्नी के संबंधों में कटुता आ जाए, तो पति या पत्नी, या संभव हो, तो दोनों, ऊपर वर्णित मंत्र का पांच माला जप इक्कीस दिन तक प्रतिदिन करें। जप निष्ठापूर्वक करें, तनाव दूर होगा और वैवाहिक जीवन में माधुर्य बढ़ेगा। मंगल दोष के कारण वैवाहिक जीवन में कलह या तनाव होने की स्थिति में निम्नोक्त क्रिया करें। पति या पत्नी, या फिर दोनों, मंगलवार का व्रत करें और हनुमान जी को लाल बूंदी, सिंदूर व चोला चढ़ाएं। तंदूर की मीठी रोटी दान करें। मंगलवार को सात बार एक-एक मुट्ठी रेवड़ियां नदी में प्रवाहित करें। गरीबों को मीठा भोजन दान करें। मंगल व केतु के दुष्प्रभाव से मुक्ति हेतु रक्त दान करें। चांदी का जोड़ विहीन छल्ला धारण करें। ================================================================================ पति पत्नी के बीच प्रेम कम होने का अन्य कारण वास्तु दोष भी होता हैं -- ----जब दंपत्ति एक ही बेड पर दो अलग-अलग गद्दे का उपयोग करते हैं तो उनके बीच होने वाला मतभेद बढ़ने की संभावना और अधिक हो जाती है। ---पति-पत्नी के रिश्ते को मजबूत बनाये रखने के लिए बेड को कभी भी घर के बीम के नीचे नहीं लगाना चाहिए।बीम अलगाव का प्रतीक माना जाता है जो रिश्तों में दूरियां लाता है। ----नवविवाहित दंपत्ति को संतान प्राप्ति तक वायव्य यानी उत्तर पश्चिम या उत्तर दिशा के मध्य के शयन कक्ष में सोना चाहिए। इससे प्रेम बढ़ता है और जल्दी संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती है। ----पति पत्नी के संबधो में मजबूती के लिए बैडरुम की दिवारो को गुलाबी या पीले रंग से कलर करवाना चाहिए। तथा छत पर यदि लोहे की गाटर लगी हो तो उसके नीचे बैड नही लगाना चाहिए। ----वैवाहिक जीवन में मधुरता के लिए घर में रोजाना या कम से कम सप्ताह में एक बार नमक मिले पानी का पौछा अवश्य लगाये। ---यदि पति पत्नी में ज्यादा कलह रहता है तो घर के लिए आटा शनिवार को ही पिसवाएं या खरीदे। इस आटे में यदि कुछ पिसे काले चने का आटा भी मिला सके तो ज्यादा शुभ परिणाम सामने आते है। ---ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार पति-पत्नी जिस कमरे में सोते है उस कमरे में ड्रेसिंग टेबल नहीं होना चाहिए। यदि ड्रेसिंग टेबल उसी कमरे में रखना पड़े तो उससे इस प्रकार रखे की सोते और उठाते समय उस पर नजर ना पड़े।यदि ऐसा करना अनिवार्य हो तो रात को सोने से पहले इस दर्पण को किसी चादर से ढक देना चाहिए। -----पति पत्नी में मधुर संबधो के लिए बैडरुम की दिवार पर राधा-कृष्ण, खिले हुए गुलाब, या हंसते हुए बच्चे का चित्र लगाना भी शुभ माना जाता है। ----पति पत्नी के बीच का प्रेम और विश्वास बनाए रखने के लिए बिस्तर पर बिछे तकिए का खोल और चादर दो तीन दिनों पर बदलते रहना चाहिए। ----पति एवं पत्नी के संबंधों में परस्पर प्रेम व मधुरता बढ़ाने हेतु शयनकक्ष में बिस्तर पर लाल रंग की चादर अथवा कम्बल या रजाई आदि का प्रयोग करने से भी काफी लाभ मिलता है। शयनकक्ष में कोई भी जल का स्रोत अथवा जल का चित्र एवं असली पौधा नहीं होना चाहिए। सोते समय दंपत्ति सिर या पैर सीधे दरवाजे की तरफ नहीं होने चाहिए एवं बिस्तर के ऊपर कोई प्रत्यक्ष दिखती हुई बीम नहीं होनी चाहिए। ----आजकल धातु से निर्मित पलंगों का चलन काफी बढ़ गया है किन्तु वास्तु की मान्यताओं के अनुसार धातु निर्मित पलंग दाम्पत्य जीवन में टकराव व कटुता की भावना उत्पन्न करता है। अतः पलंग धातु का न बनवाकर लकड़ी का ही बनवाना चाहिए। -----ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की नैर्ऋत्य कोण अर्थात दक्षिण-पश्चिमी दिशा प्रेम एवं विवाह की दिशा है। इस दिशा को उचित प्रकार से सक्रिय करके दाम्पत्य सम्बन्धों की कटुता समाप्त की जा सकती है। दाम्पत्य संबंधों में प्रांगढ़ता बढ़ाने हेतु शयनकक्ष के अन्दर दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक नर व एक मादा मैन्डारिन बत्तखों की मूर्ति जोड़े से लगाएं। ----शयनकक्ष के दक्षिण-पश्चिम भाग में दो असली क्वाट्र्ज क्रिस्टल रखने से भी दाम्पत्य संबंधों में परस्पर प्रेम व प्रांगढ़ता की वृद्धि होती है। विवाहित दंपत्ति का एक साथ खिंचा हुआ चित्र शयनकक्ष के अन्दर उसकी दक्षिण-पश्चिम दिशा में रखने से दाम्पत्य जीवन का तनाव दूर होता है। ----ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शयनकक्ष में यदि कोई दर्पण इस प्रकार से लगा हुआ है जिसमें सोते समय पति अथवा पत्नी का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, तो वास्तु की मान्यता अनुसार इस प्रकार शयनकक्ष में लगा दर्पण शैनेः शैनेः दाम्पत्य सम्बन्धों में भारी तनाव उत्पन्न कर देता है। अतः दर्पण को इस प्रकार से शयनकक्ष में लगाएं की सोते समय उसमें दंपत्ति का प्रतिबिम्ब न दिखलाई पड़े। यदि किसी कारण से ऐसा करना संभव न हो पा रहा हो तो दर्पण को किसी परदे आदि से ढक कर रखें। =============================================================================== आपके वैवाहिक जीवन में आ रही परेशानी के निवारण के लिए निम्न उपाय करें --- ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वैवाहिक जीवन में यदि तनाव या संघर्ष की स्थिति हो तो इसके पीछे कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोग तो होते ही हैं अतः यदि इनके लिए समय से सटीक उपाय निरंतर रूप से किये जाएँ तो निश्चित ही उनका सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में बने ग्रहयोग भिन्न होने से सबके लिए व्यक्तिगत उपाय भी अलग ही होते हैं पर यहाँ हम कुछ ऐसे सामान्य उपाय बता रहे हैं जो वैवाहिक जीवन की समस्यायों में सभी के लिए उपयोगी हैं – रोज रात में सोने से पहले चने की दाल को भिगो दे. सुबह उठने पर नहाने के बाद इसे गुड़ में मिलाकर किसी गे को खिला दे. इसके अलावा भगवान् विष्णु के मंदिर में जाकर बेसन के लड्डू चढ़ाये गरीबो में बाँट दे. यदि वैवाहिक जीवन में तनाव है तो शुक्ल पक्ष से हर सोमवार को साबूत हल्दी पानी से भरे कुएं में डाले।(shukhi shadi ke tone totke) तनाव जल्दी ही समाप्त हो जायेगा। पति पत्नी में मतभेद होने की स्थिति में 11 गोमती चक्रो को लाल रंग की सिंदूर की डिब्बी में रखकर इस डिब्बी को घर मे किसी साफ जगह पर रखे। मतभेद दूर होकर घर में प्रेम का माहौल तैयार होगा। वैवाहिक जीवन में शांति और प्रेम के लिए शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरुवार को एक घी की कटौरी भरकर पति पत्नी को उसमें अपना चैहरा देखना चाहिए । और फिर इस कटौरी को घी सहित किसी मंदिर में चढ़ा दे। नियमित रूप से थोड़े से केसर को दूध में भिगो कर अपनी नाभि में लगाए, रोज केसर के दूध का सेवन करे. हर गुरुवार के दिन केले की जड़ का पूजन चने की दाल गुड़ से करे, गरीबो को केलो का दान करे. अपने सप्तमेश ग्रह के मंत्र का जाप करें। यदि सप्तम भाव में कोई पाप योग हो या पाप ग्रह हो तो उसका दान करें। पुरुष जातक शुक्र मंत्र – ॐ शुम शुक्राय नमः का नियमित जाप करें। स्त्री जातक – ॐ अंग अंगरकाय नमः का जाप करें। पुरुष जातक प्रत्येक शुक्रवार को गाय को चावल की खीर खिलाएं। स्त्री जातक प्रत्येक मंगल और गुरूवार को गाय को गुड खिलाएं। किसी भी देवी के मंदिर में जाकर देवी माँ को सिंदूर अर्पित करे पांच सुहागनों को सिंदूर को उपहार स्वरुप दे. शुभ फल पाने के लिए करे पारद से बने गणेशजी की पूजा भगवान को मधुपर्क चढाने से होती है सभी मनोकामनाएं पूरी गणेशजी की पूजा में ज़रूर करे शमी के पत्तो का प्रयोग | यदि पति पत्नी पूरी तरह से वैवाहिक सुख प्राप्त नही कर पा रहे हो तो 4 रविवार तक लगातार सुबह पीपल के पेड के सामने तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए। यदि पति पत्नी में ज्यादा कलह रहता है तो घर के लिए आटा शनिवार को ही पिसवाएं या खरीदे। इस आटे में यदि कुछ पिसे काले चने का आटा भी मिला सके तो ज्यादा शुभ परिणाम सामने आते है। ======================================================================= ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री से जानिए अनुभूत उपाय : --- उचित समय पर विवाह हेतु कन्या को कम से कम सवा पांच रत्ती का पुखराज सोने की अंगूठी में गुरुवार को बायें हाथ की तर्जनी में और कम से कम सात रत्ती का फीरोजा चांदी की अंगूठी में शुक्रवार को बायें हाथ की कनिष्ठिका में धारण कराना चाहिए। इनके अतिरिक्त उपाय व निवारण में यंत्र की पूजा भी करनी चाएि। यदि कुंडली में वैधव्य योग हो, तो शादी से पहले घट विवाह, अश्वत्थ विवाह, विष्णु प्रतिमा या शालिग्राम विवाह विवाह कराना तथा प्रभु शरण में रहना चाहिए। वैवाहिक जीवन में सुखानुभूति हेतु सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए निम्नलिखित मंत्र का जप विधि विधानपूर्वक करना चाहिए। मंत्र : ऐं श्रीं क्लिम् नमस्ते महामाये महायोगिन्धीश्वरी। सामान्जस्यम सर्वतोपाहि सर्व मंगल कारिणीम्॥ शुक्ल पक्ष के गुरुवार को स्नान करके शाम के समय पूजा प्रारंभ करें। पूजा के समय मुख-पश्चिम की ओर होना चाहिए। दुर्गा जी का चित्र सामने रखकर गाय के घी का दीप जलाएं। समान वजन की सोने की दो अंगूठियां देवी मां के चरणों में अर्पित करें। गुलाब के 108 पुष्प 108 बार मंत्र पढ़कर अर्पित करें। लाल चंदन की माला से 21 दिन तक प्रतिदिन एक माला जप करें। 21 दिन बाद मां के चरणों में अर्पित अंगूठियां लेकर एक किसी योग्य और कर्मनिष्ठ ब्राह्मण को दे दें और दूसरी स्वय पहन लें। यह पूजा-अर्चना निष्ठापूर्वक करें, दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा। इसके अतिरिक्त श्री दुर्गा-सप्तशती का स्वयं पाठ करें। अष्टकवर्ग के नियमानुसार यदि सर्वाष्टक वर्ग में सातवें विवाह भाव में शुभ बिंदुओं की संखया जितनी कम हो, दाम्पत्य जीवन उतना ही दुखद होता है। वर्ग में बिंदुओं की संखया 25 से कम होने की स्थिति में वैवाहिक जीवन अत्यंत दुखद होता है। लाल किताब के योग एवं उपाय शुक्र एवं राहु की किसी भी भाव में युति वैवाहिक जीवन के लिए दुखदायी होती है। यह युति पहले भाव 4 या 7 में हो, तो पति-पत्नी में तलाक की नौबत आ जाती है या अकाल मृत्यु की संभावना रहती है। उपाय ---यदि ऐसा विवाह हो चुका हो, तो चांदी के गोल वर्तन में काजल या बहते दरिया का पानी और शुद्ध चांदी का टुकड़ा डालकर किसी धर्मस्थान में देना चाहिए। साथ ही एक चांदी के बर्तन में गंगाजल या किसी अन्य बहते दरिया का पानी और चांदी का टुकड़ा डालकर अपने पास रखना चाहिए। यह उपाय विवाह से पूर्व या बाद में कर सकते हैं। यदि सातवें भाव में राहु हो, तो विवाह के संकल्प के समय बेटी वाला चांदी का एक टुकड़ा बेटी को दे। इससे बेटी के दाम्पत्य जीवन में क्लेश की संभावना कम रहती है। यह उपाय लग्न में राहु रहने पर भी कर सकते हैं, क्योंकि इस समय राहु की दृष्टि सातवें भाव पर होती है। यदि भाव 1 या 7 में राहु अकेला या शुक्र के साथ हो, तो 21 वें वर्ष या इससे पूर्व विवाह होने पर वैवाहिक जीवन दुखमय होता है। अतः उपाय के तौर पर विवाह 21 वर्ष के पश्चात ही कुंडली मिलान करके करें। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार सूर्य और बुध के साथ शुक्र की युति किसी भी भाव में होने पर वैवाहिक जीवन में कुछ न कुछ दोष अवश्य ही उत्पन्न होता है, जिससे दाम्पत्य जीवन दुखमय रहता है। उपाय तांबे के एक लोटे में साबुत मूंग भरकर विवाह के संकल्प के समय हाथ लगाकर रखना चाहिए और इसे जल में प्रवाहित करना चाहिए। यदि यह उपाय विवाह के समय न हो सके, तो जिस वर्ष उक्त तीनों ग्रह लाल किताब के वर्षफलानुसार आठवें भाव में आएं, उस वर्ष कर सकते हैं। शुक्र यदि आठवें भाव में हो, तो जातक की पत्नी सखत स्वभाव की होती है, जिससे आपसी सामंजस्य का अभाव रहता है। इस योग की स्थिति में विवाह 25 वर्ष की उम्र के बाद ही करना चाहिए। इसके पहले विवाह करने पर पत्नी के स्वास्थ्य के साथ-साथ गृहस्थ सुख पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। उपाय आठवें भाव में स्थित शुक्र के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए नीले रंग के फूल घर से बाहर जमीन में दबा दें या गंदे नाले में डाल दें। सर्वजन हितार्थ उपाय जातक या जातका की जन्मपत्री में किसी भी प्रकार का दोष या कुयोग होने के कारण विवाह में बहुत बाधाएं आती हैं। इन बाधाओं के फलस्वरूप न केवल लड़का या लड़की बल्कि समस्त परिवार तनावग्रस्त रहता है। यहां कुछ उपाय प्रस्तुत हैं, जिनका उपयोग करने से इन बाधाओं से बचाव हो सकता है। ये उपाय जन्मपत्री नहीं होने की स्थिति में भी किए जा सकते हैं। वर प्राप्ति हेतु मंत्र गुरुवार को किसी शुभ योग में उक्त मंत्र का फीरोजा की माला से पांच माला जप करें। यह क्रिया ग्यारह गुरुवार करें, विवाह शीघ्र होगा। सोमवार को पारद शिवलिंग के सम्मुख उक्त मंत्र का 21 माला जप करें। फिर यह जप सात सोमवार को नियमित रूप से करें, शीघ्र विवाह के योग बनेंगे। भुवनेश्वरी यंत्र के सम्मुख उक्त मंत्र का सवा लाख जप करें, शीघ्र विवाह योग बनेंगे। मंत्र : कात्यायनी महामाये महायोगिनी धीश्वरी। नन्द गोपसुतं देवि पतिं ते कुरु ते नमः । मां पार्वती के चित्र के सामने, पूजा करने के पश्चात उक्त मंत्र का ग्यारह माला जप करें। यह क्रिया 21 दिनों तक नियमित रूप से करें, मां पार्वती मनोवांछित वर प्रदान करेंगी। ======================================================================== हम आपको कुछ अन्य सामाजिक कारण बता रहे हैं जिनसे आप जानेंगे कि पति-पत्नी शादी के बाद एक दूसरे को धोखा क्यों देते हैं। शादी में बेवफाई के कारण : जब कोई पार्टनर रिश्ते में नजरंदाज किया गया महसूस करता है तो उसके बेवफाई करने के अवसर बढ़ जाते हैं। ऐसा होने पर वह किसी और की तलाश शुरू कर देता है और फिर मौका मिलते ही धोखा देना शुरू कर देता है। चूंकि यह गलत है इसलिए यहीं से रिश्ते में बेवफाई का बीज बोने की तैयारी शुरू होती है। ज्यादा की चाह : शादी में बेवफ़ाई का दूसरा कारण है कुछ ज्यादा पाने की तमन्ना करना। जब किसी पार्टनर को रिश्ते में खुशी और आनंद नहीं मिलती है तो निःसन्देह गुपचुप तरीके से कुछ और पाने की चाह रखता है और फिर रिश्ता टूट जाता है। असंतुष्टि की सीमा पार होना : बहुत से पति पत्नी हैं जो एक दूसरे से संतुष्ट नहीं हैं। हालही में किए गए अध्ययन के अनुसार 50 प्रतिशत पार्टनर बेवफ़ाई के कारण रिश्ता तोड़ देते हैं। इस प्रकार असंतुष्टि भी एक कारण है जिससे पार्टनर एक दूसरे को धोखा देते हैं। बोर होना या जीवन में उदासी छाना बोर होना : जितना समान्य लगता है उतना है नहीं, इससे रिश्ते भी टूट सकते हैं। एक्स्पर्ट्स के अनुसार यह भी बेवफाई का कारण हो सकता है। कुछ लोग हैं जो शादी के कुछ सालों बाद रिश्ते में हुई बोरियत को झेल लेते हैं लेकिन कुछ लोग हैं जो मनोरंजन के लिए रिश्ते के अलावा बाहर कहीं मुह मारते हैं। श्रीमान जी, धन्यवाद..
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01-01-1970 Blog

विशेष--राष्ट्रीय युवा दिवस 2018 - 12 जनवरी (शुक्रवार)

स्वामी विवेकानन्द जन्म जयन्ती-12 जनवरी 2018 ... प्रिय पाठकों.मित्रों, हमारे देश भारत में पूरे उत्साह और खुशी के साथ राष्ट्रीय युवा दिवस "युवा दिवस" या "स्वामी विवेकानंद जन्म दिवस" के रूप में मनाया जाता है। पौष कृष्णा सप्तमी तिथि में वर्ष 1863 में 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था। स्वामी विवेकानंद का जन्म दिवस हर वर्ष रामकृष्ण मिशन के केन्द्रों पर, रामकृष्ण मठ और उनकी कई शाखा केन्द्रों पर भारतीय संस्कृति और परंपरा के अनुसार मनाया जाता है,इसे आधुनिक भारत के निर्माता स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस को याद करने के लिये मनाया जाता है। राष्ट्रीय युवा दिवस के रुप में स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस को मनाने के लिये वर्ष 1984 में भारतीय सरकार द्वारा इसे पहली बार घोषित किया गया था। तब से (1985), पूरे देश भर में राष्ट्रीय युवा दिवस के रुप में इसे मनाने की शुरुआत हुई। भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती, अर्थात १२ जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् १९८४ ई. को 'अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष' घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन १९८४ से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए। इस सन्दर्भ में भारत सरकार का विचार था कि - ऐसा अनुभव हुआ कि स्वामी जी का दर्शन एवं स्वामी जी के जीवन तथा कार्य के पश्चात निहित उनका आदर्श—यही भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है। ========================================================================= स्वामी विवेकानंद का जन्म और उनका परिवार एवं शिक्षा आदि--- नाम- स्वामी विवेकानंद (जन्म नाम- नरेन्द्रनाथ दत्ता) जन्म- 12 जनवरी 1863 कलकत्ता मृत्यु- 4 जुलाई 1902 (उम्र 39) बेलूर मठ, बंगाल रियासत, ब्रिटिश राज (अब बेलूर, पश्चिम बंगाल में) राष्ट्रीयता- भारतीय संस्थापक- रामकृष्ण मिशन ( 1 मई, 1897 ) गुरु/शिक्षक - श्री रामकृष्ण परमहंस ============================================================================== स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी,1863 में हुआ। पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे। दुर्गाचरण दत्ता, (नरेंद्र के दादा) संस्कृत और फारसी के विद्वान थे उन्होंने अपने परिवार को 25 की उम्र में छोड़ दिया और एक साधु बन गए। उनकी माता भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की महिला थीं। उनका अधिकांश समय भगवान शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था। नरेंद्र के पिता और उनकी माँ के धार्मिक, प्रगतिशील व तर्कसंगत रवैया ने उनकी सोच और व्यक्तित्व को आकार देने में मदद की। स्वामी विवेकानन्द के बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। वह बाल्यावस्था से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उनके घर में नियमपूर्वक प्रतिदिन पूजा-पाठ होता था। साथ ही नियमित रूप से भजन-कीर्तन भी होता रहता था। परिवार के धार्मिक वातावरण का उन पर भी प्रभाव गहरा पड़ा। वह वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से अत्यधिक प्रभावित थे। उन्होंने अपने गुरु से ही यह ज्ञान प्राप्त किया कि समस्त जीव स्वयं परमात्मा का ही अंश हैं, इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है।स्वामी विवेकानंद को पूरी दुनिया में उनके ज्ञान, वक्तृता और स्मरणशक्ति के लिए जाना जाता है लेकिन वो बीए की परीक्षा सेकंड डिविजन में पास हुए थे।दैवयोग से विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेन्द्र पर आ पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। अत्यन्त दर्रिद्रता में भी नरेन्द्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रात भर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते। कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली परिवार में जन्मे विवेकानंद आध्यात्मिकता की ओर झुके हुए थे। वे अपने गुरु रामकृष्ण देव से काफी प्रभावित थे जिनसे उन्होंने सीखा कि सारे जीव स्वयं परमात्मा का ही एक अवतार हैं। इसलिए मानव जाति की सेवा द्वारा परमात्मा की भी सेवा की जा सकती है। रामकृष्ण की मृत्यु के बाद उन्होंने बड़े पैमाने पर भारतीय उपमहाद्वीप का दौरा किया और मौजूदा स्थितियों का पहले ज्ञान हासिल किया। बाद में विश्व धर्म संसद 1893 में भारत का प्रतिनिधित्व करने, संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए कूच किया। उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप में हिंदू दर्शन के सिद्धांतों का प्रसार किया, सैकड़ों सार्वजनिक और निजी व्याख्यानों का आयोजन किया। भारत में, विवेकानंद को एक देशभक्त संत के रूप में माना जाता है। वे अध्यात्म की अतल गहराइयों में डुबकी लगाने वाले योग साधक थे तो व्यवहार में जीने वाले गुरु भी थे। वे प्रज्ञा के पारगामी थे तो विनम्रता की बेमिशाल नजीर भी थे। वे करुणा के सागर थे तो प्रखर समाज सुधारक भी थे। उनमें वक्तृता थी तो शालीनता भी। कृशता थी तो तेजस्विता भी। आभिजात्य मुस्कानों के निधान, अतीन्द्रिय चेतना के धनी, प्रकृति में निहित गूढ़ रहस्यों को अनावृत्त करने में सतत् संलग्न, समर्पण और पुरुषार्थ की मशाल, सादगी और सरलता से ओतप्रोत, स्वामी विवेकानन्द का समग्र जीवन स्वयं एक प्रयोगशाला था। स्वामी विवेकानन्द की मेघा के दर्पण से वेदान्त, दर्शन, न्याय, तर्कशास्त्र, समाजशास्त्र, योग, विज्ञान, मनोविज्ञान आदि बहुआयामी पावन एवं उज्ज्वल बिम्ब उभरते रहे। वे अतुलनीय संपदाओं के धनी थे। वे दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य के एक उत्साही पाठक थे। इनकी वेद, उपनिषद, भगवद् गीता, रामायण, महाभारत और पुराणों के अतिरिक्त अनेक हिन्दू शास्त्रों में गहन रूचि थी। उनको बचपन में भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित किया गया था और ये नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम में व खेलों में भाग लिया करते थे। उन्होंने पश्चिमी तर्क, पश्चिमी दर्शन और यूरोपीय इतिहास का अध्ययन किया। 1881 में इन्होंने ललित कला की परीक्षा उत्तीर्ण की, और 1884 में कला स्नातक की डिग्री पूरी कर ली। रामकृष्ण परमहंस से संपर्क में आने के बाद नरेंद्रनाथ ने करीब 25 साल की उम्र में संन्यास ले लिया। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के देहांत के बाद स्वामी विवेकानंद ने पूरे देश में रामकृष्ण मठ की स्थापना की थी। विवेकानंद को पूरी दुनिया में भारतीय दर्शन और वेदांत का सर्वप्रमुख विचारक और प्रचारक माना जाता है। महज 39 वर्ष की उम्र में चार जुलाई 1902 को उनका देहांत हो गया। उल्लेखनीय है कि 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता के कायस्थ परिवार में जन्मे स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व कर उसे सार्वभौमिक पहचान दिलाई। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उनके बारे में कहा था-"यदि आप भारत को जानना चाहते हैं, तो विवेकानन्द को पढ़िये। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं।" स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस पर अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार वर्ष 1985 को अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया। पहली बार वर्ष 2000 में अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन आरंभ किया गया था। संयुक्त राष्ट्र ने 17 दिसंबर 1999 को प्रत्येक वर्ष 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी। अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का अर्थ है कि सरकार युवा के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे। भारत में इसका प्रारंभ वर्ष 1985 से हुआ, जब सरकार ने स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस पर अर्थात 12 जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। युवा दिवस के रूप में स्वामी विवेकानन्द का जन्मदिवस चुनने के बारे में सरकार का विचार था कि स्वामी विवेकानन्द का दर्शन एवं उनका जीवन भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है। इस दिन देश भर के विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में कई प्रकार के कार्यक्रम होते हैं, रैलियां निकाली जाती हैं, विभिन्न प्रकार की स्पर्धाएं आयोजित की जाती है, व्याख्यान होते हैं तथा विवेकानन्द साहित्य की प्रदर्शनियां लगाई जाती हैं। ================================================================================= गुरु के प्रति निष्ठा--- एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और निष्क्रियता दिखायी तथा घृणा से नाक-भौं सिकोड़ीं। यह देखकर स्वामी विवेकानन्द को क्रोध आ गया। उस गुरु भाई को पाठ पढ़ाते और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर फेंकते थे। गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक भंडार की महक फैला सके। उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी ऐसी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा! =============================================================================== जानिए विवेकानंद की जयंती पर पढ़िए उनके जीवन से जुड़े पांच रोचक प्रसंग--- 1- सड़क किनारे गांजा पीना- बात 1888 की है। स्वामी विवेकानंद भारत भ्रमण पर थे। आगरा और वृंदावन के बीच एक जगह विवेकानंद को एक व्यक्ति सड़क किनारे चिलम में गांजा पीता दिख गया। उन्होंने उस व्यक्ति के पास जाकर कहा कि वो भी गांजा पिएंगे। उस व्यक्ति ने स्वामीजी से कहा कि आप साधु हैं और मैं भंगी हूं। उसकी बात सुनकर पहले तो स्वामीजी उठकर खड़े हो गये लेकिन तुरंत उनके ज़हन में ख्याल आया कि वो संन्यासी हैं और उनका किसी जाति और परिवार से संबंध नहीं रह गया है। उसके बाद विवेकानंद ने उस व्यक्ति के साथ बैठकर आराम से चिलम पी। विवेकानंद ने बाद में इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा है, "किसी इंसान से घृणा मत करो। सभी मनुष्य ईश्वर की संतान हैं।" 2- सेकंड डिविजन वाले विद्यार्थी- स्वामी विवेकानंद को पूरी दुनिया में उनके ज्ञान, वक्तृता और स्मरणशक्ति के लिए जाना जाता है। आपको ये जानकर हैरानी हो सकती है कि यूनिवर्सिटी की प्रवेश परीक्षा में उन्हें महज 47 प्रतिशत अंक मिले थे। वहीं एफए (बाद में इंटरमीडिएट) में उन्हें 46 प्रतिशत और बीए में 56 प्रतिशत अंक मिले थे। 3- मूर्तिपूजा का औचित्य- 1891 में अलवर (राजस्थान की एक रियासत) के दीवान ने विवेकानंद को राजा मंगल सिंह से मुलाकात के लिए बुलावा भेजा। मंगल सिंह ने विवेकानंद से कहा कि "स्वामीजी ये सभी लोग मूर्तिपूजा करते हैं। मैं मूर्तिपूजा में यकीन नहीं करता। मेरा क्या होगा?" पहले तो स्वामीजी ने कहा कि "हर किसी को उसका विश्वास मुबारक।" फिर कुछ सोचते हुए स्वामीजी ने राजा का चित्र लाने के लिए कहा। जब दीवार से उतारकर राजा का तैल चित्र लाया गया तो स्वामीजी ने दीवान से तस्वीर पर थूकने के लिए कहा। दीवान उनकी बात से हक्काबक्का रह गया। उसे हिचकाचते देख स्वामीजी ने कहा कि ये तस्वीर तो महज कागज है राजा नहीं फिर भी आप लोग इस पर थूकने से हिचक रहे हैं क्योंकि आप सबको पता है कि ये आप के राजा का प्रतीक है? स्वामीजी ने राजा से कहा, "आप जानते हैं कि ये केवल चित्र है फिर भी इस पर थूकने पर आप अपमानित महसू करेंगे। यही बात उन सभी लोगों पर लागू होती है जो लकड़ी, मिट्टी और पत्थर से बनी मूर्ति की पूजा करते हैं। वो इन धातुओं की नहीं बल्कि अपने ईश्वर के प्रतीक की पूजा करते हैं। 4- एक दशक से ज्यादा लम्बी मुकदमेबाजी- विवेकानंद के मामा तारकनाथ के देहांत के बाद उनकी मामी ने विवेकानंद के परिवार को पारिवारिक घर से बाहर करते हुए उन पर मुकदमा कर दिया। विवेकानंद करीब 14 सालों तक ये मुकदमे लड़ते रहे। अपनी मृत्यु से करीब एक हफ्ते पहले ही उन्होंने अदालत से बाहर समझौता करके मुकदमे का अंत किया। 5- मठ में औरतों के प्रवेश पर रोक- स्वामी विवेकानंद के मठ में किसी भी औरत का प्रवेश निषिद्ध था। एक बार जब विवेकानंद को तेज बुखार था तो उनके शिष्यों ने उनकी माँ को उन्हें देखने के लिए मठ के अंदर आने दिया। विवेकानंद इस बात से नाराज हो गए। विवेकानंद ने अपने शिष्यों को डांटते हुए कहा, "तुम लोगों ने एक महिला को अंदर क्यों आने दिया? मैंने ही नियम बनाया और मेरे लिए ही नियमों को तोड़ा जा रहा है!" विवेकानंद ने शिष्यो से साफ कह दिया कि मठ के किसी नियम को उनके लिए भी न तोड़ा जाए। ============================================================================== स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं: १. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके। २. शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भन बने। ३. बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए। ४. धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए। ५. पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए। ६. शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती है। ७. शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए। ८. सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जान चाहिये। ९. देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाय। १०. मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए। ================================================================================ किसी भी देश के युवा उसका भविष्य होते हैं। उन्हीं के हाथों में देश की उन्नति की बागडोर होती है। आज के पारिदृश्य में जहां चहुं ओर भ्रष्टाचार, बुराई, अपराध का बोलबाला है जो घुन बनकर देश को अंदर ही अंदर खाए जा रहे हैं। ऐसे में देश की युवा शक्ति को जागृत करना और उन्हें देश के प्रति कर्तव्यों का बोध कराना अत्यंत आवश्यक है। विवेकानंद जी के विचारों में वह क्रांति और तेज है जो सारे युवाओं को नई चेतना से भर दे। उनके दिलों को भेद दे। उनमें नई ऊर्जा और सकारात्मकता का संचार कर दें। स्वामीजी ने कहा 'मेरी आशाएं युवा वर्ग पर टिकी हुई हैं'। स्वामी जी को यु्वाओं से बड़ी उम्मीदें थीं। उन्होंने युवाओं की अहं की भावना को खत्म करने के उद्देश्य से कहा है 'यदि तुम स्वयं ही नेता के रूप में खड़े हो जाओगे, तो तुम्हें सहायता देने के लिए कोई भी आगे न बढ़ेगा। यदि सफल होना चाहते हो, तो पहले 'अहं' ही नाश कर डालो।' उन्होंने युवाओं को धैर्य, व्यवहारों में शुद्ध‍ता रखने, आपस में न लड़ने, पक्षपात न करने और हमेशा संघर्षरत् रहने का संदेश दिया। व्यक्ति की शिक्षा ही उसे भविष्य के लिए तैयार करती है, इसलिए शिक्षा में उन तत्वों का होना आवश्यक है, जो उसके भविष्य के लिए महत्वपूर्ण हो। स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में, तुमको कार्य के सभी क्षेत्रों में व्यावहारिक बनना पड़ेगा। सिद्धान्तों के ढेरों ने सम्पूर्ण देश का विनाश कर दिया है। आज भी स्वामी विवेकानंद को उनके विचारों और आदर्शों के कारण जाना जाता है। आज भी वे कईं युवाओं के लिए प्रेरणा के स्त्रोत बने हुए हैं। स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस- युवा दिवस पर उनको हार्दिक नमन्..वंदन...
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चंद्र ग्रहण 31 जनवरी 2018 पर सम्पूर्ण जानकारी (कब,क्यों,केसे ओर किस राशी पर क्या होगा इस ग्रहण का प्रभाव सहित अन्य जानकारियाँ

चंद्र ग्रहण 31 जनवरी 2018 पर सम्पूर्ण जानकारी (कब,क्यों,केसे ओर किस राशी पर क्या होगा इस ग्रहण का प्रभाव सहित अन्य जानकारियाँ) प्रिय पाठकों/मित्रों, चन्द्रमा और सूर्य के बीच में पृथ्वी के आ जाने को ही चन्द्र ग्रहण कहते हैं। चंद्र ग्रहण तब होता है, जब सूर्य व चन्द्रमा के बीच पृथ्वी इस प्रकार से आ जाती है कि पृथ्वी की छाया से चन्द्रमा का पूरा या आंशिक भाग ढक जाता है। इस स्थिति में पृथ्वी सूर्य की किरणों के चन्द्रमा तक पहुँचने में अवरोध लगा देती है तो पृथ्वी के उस हिस्से में चन्द्र ग्रहण नज़र आता है। इस ज्यामितीय प्रतिबंध के कारण चन्द्र ग्रहण केवल पूर्णिमा की रात्रि को घटित हो सकता है। 31 जनवरी 2018 को इस वर्ष का पहला चंद्र ग्रहण घटित होगा। यह पूर्ण चंद्र ग्रहण होगा, जो भारत समेत विश्व के कई देशों में देखा जाएगा। चंद्र ग्रहण को ज्योतिष शास्त्र में काफी महत्वपर्ण माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चंद्र ग्रहण का असर हम सभी की राशि पर पड़ता है। जिससे हमारे जीवन में कई तरह के बदलाव आते हैं। प्रिय पाठकों/मित्रों, ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की इस नए वर्ष 2018 में दो चंद्रग्रहण व तीन सूर्य ग्रहण होंगे। सौर मंडल का प्रमुख ग्रह चंद्रमा सदी के पहले ग्रहण के रूप में 31 जनवरी को दिखाई देगा। दूसरा चंद्र ग्रहण 27 जुलाई को होगा। वहीं तीन सूर्य ग्रहण भी होंगे, लेकिन यह भारत में नहीं दिखाई देंगे। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार 31 जनवरी को पहला चंद्र ग्रहण पुष्य, अश्लेषा नक्षत्र एवं कर्क राशि में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को बुधवार के दिन होगा। ज्योतिष गणना के अनुसार ग्रहण की काली छाया शाम 5.18 बजे चंद्रमा को स्पर्श पर लेगी। इसके बाद 6.22 बजे खग्रास काल प्रारम्भ होगा, जो ग्रहण के मोक्ष काल 8.41 बजे तक रहेगा। पूरा ग्रहण 3 घंटे 23 मिनट का रहेगा। भारत में यह चन्द्र ग्रहण आसाम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, पूर्वी पश्चिम बंगाल में चंद्रोदय के बाद शुरू होगा। देश के बाकी हिस्सों में ग्रहण चंद्रोदय से पहले आरंभ हो जाएगा, अर्थात ग्रस्तावस्था रूप में दिखाई देगा यह चन्द्र ग्रहण आस्ट्रेलिया, एशिया, उत्तरी अमेरिका में भी ग्रहण दिखाई देगा। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की सूर्य संपूर्ण जगत की आत्मा का कारक ग्रह है। वह संपूर्ण चराचर जगत को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करता है इसलिए कहा जाता है कि सूर्य से ही सृष्टि है। अतः बिना सूर्य के जीवन की कल्पना करना असंभव है। चंद्रमा पृथ्वी का प्रकृति प्रदत्त उपग्रह है। यह स्वयं सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होकर भी पृथ्वी को अपने शीतल प्रकाश से शीतलता देता है। यह मानव के मन मस्तिष्क का कारक व नियंत्रणकर्ता भी है। सारांश में कहा जा सकता है कि सूर्य ऊर्जा व चंद्रमा मन का कारक है। सामान्य दिन के मुकाबले चंद्र ग्रहण में किया पुण्यकर्म एक लाख गुना और सूर्यग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता। पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की राहु-केतु इन्हीं सूर्य व चंद्र मार्गों के कटान के प्रतिच्छेदन बिंदु हैं जिनके कारण सूर्य व चंद्रमा की मूल प्रकृति, गुण, स्वभाव में परिवर्तन आ जाता है। यही कारण है कि राहु-केतु को हमारे कई पौराणिक शास्त्रों में विशेष स्थान प्रदान किया गया है। राहु की छाया को ही केतु की संज्ञा दी गई है। राहु जिस राशि में होता है उसके ठीक सातवीं राशि में उसी अंशात्मक स्थिति पर केतु होता है। मूलतः राहु और केतु सूर्य और चंद्रमा की कक्षाओं के संपात बिंदु हैं जिन्हें खगोलशास्त्र में चंद्रपात कहा जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की ज्योतिष के खगोल शास्त्र के अनुसार राहु-केतु खगोलीय बिंदु हैं जो चंद्र के पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने से बनते हैं। राहू-केतू द्वारा बनने वाले खगोलीय बिंदु गणित के आधार पर बनते हैं तथा इनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं है। अतः ये छाया ग्रह कहलाते हैं। छाया ग्रह का अर्थ किसी ग्रह की छाया से नहीं है अपितु ज्योतिष में वे सब बिंदु जिनका भौतिक अस्तित्व नहीं है, लेकिन ज्योतिषीय महत्व है, छाया ग्रह कहलाते हैं जैसे गुलिक, मांदी, यम, काल, मृत्यु, यमघंटक, धूम आदि। ये सभी छाया ग्रह की श्रेणी में आते हैं और इनकी गणना सूर्य व लग्न की गणना पर आधारित होती है। प्रिय पाठकों/मित्रों, ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की ज्योतिष में छाया ग्रह का महत्व अत्यधिक हो जाता है क्योंकि ये ग्रह अर्थात बिंदु मनुष्य के जीवन पर विषेष प्रभाव डालते हैं। राहु-केतु का प्रभाव केवल मनुष्य पर ही नहीं बल्कि संपूर्ण भूमंडल पर होता है। जब भी राहु या केतु के साथ सूर्य और चंद्र आ जाते हैं तो ग्रहण योग बनता है। ग्रहण के समय पूरी पृथ्वी पर कुछ अंधेरा छा जाता है एवं समुद्र में ज्वार उत्पन्न होते हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की यदि आपकी कुंडली में ग्रहण दोष है तो "ग्रहण दोष शांति पूजा" के लिए यह दिन सर्वोत्तम है. "पितृ दोष शांति " और "वैदिक चन्द्र शांति पूजा " के लिए भी यह दिन उपयुक्त माना जाता है. इस दिन किये गये कार्यों का प्रभाव कई गुना अधिक हो जाता है इसलिए मन्त्र सिद्धि और किसी भी तरह के धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए ग्रहण का दिन अत्यंत ही उपयुक्त माना गया है | चंद्रग्रहण और सूर्य ग्रहण के बारे में प्राथमिक शिक्षा के दौरान ही विज्ञान की पुस्तकों में जानकारी दी जाती है कि ये एक प्रकार की खगोलीय स्थिति होती हैं। जिनमें चंद्रमा, पृथ्वी के और पृथ्वी, सूर्य के चारों ओर चक्कर काटते हुए जब तीनों एक सीधी रेखा में अवस्थिति होते हैं। जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आती है और चंद्रमा पृथ्वी की उपछाया से होकर गुजरता है तो उसे चंद्र ग्रहण कहा जाता है ऐसा केवल पूर्णिमा को ही संभव होता है। इसलिये चंद्र ग्रहण हमेशा पूर्णिमा को ही होता है। वहीं सूर्यग्रहण के दिन सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा आता है जो कि अमावस्या को संभव है। ब्रह्मांड में घटने वाली यह घटना है तो खगोलीय लेकिन इसका धार्मिक महत्व भी बहुत है। इसे लेकर आम जन मानस में कई तरह के शकुन-अपशकुन भी व्याप्त हैं। माना जाता है कि सभी बारह राशियों पर ग्रहण का प्रभाव पड़ता है। ============================================================================= जानिए चंद्र ग्रहण के प्रकार---- चन्द्र ग्रहण का प्रकार एवं अवधि चन्द्र आसंधियों के सापेक्ष चन्द्रमा की स्थिति पर निर्भर करते हैं। चन्द्र ग्रहण दो प्रकार का नज़र आता है-पूरा चन्द्रमा ढक जाने पर सर्वग्रास चन्द्रग्रहण तथा आंशिक रूप से ढंक जाने पर खण्डग्रास (उपच्छाया) चन्द्रग्रहण। पृथ्वी की छाया सूर्य से 6 राशि के अन्तर पर भ्रमण करती है तथा पूर्णमासी को चन्द्रमा की छाया सूर्य से 6 राशि के अन्तर होते हुए जिस पूर्णमासी को सूर्य एवं चन्द्रमा दोनों के अंश, कला एवं विकला पृथ्वी के समान होते हैं अर्थात एक सीध में होते हैं, उसी पूर्णमासी को चन्द्र ग्रहण लगता है। ================================================================= कितनी अवधि/समय का होगा यह चन्द्र ग्रहण--- प्रिय पाठकों/मित्रों, ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की विश्व में किसी सूर्य ग्रहण के विपरीत, जो कि पृथ्वी के एक अपेक्षाकृत छोटे भाग से ही दिख पाता है, चन्द्र ग्रहण को पृथ्वी के रात्रि पक्ष के किसी भी भाग से देखा जा सकता है। जहाँ चन्द्रमा की छाया की लघुता के कारण सूर्य ग्रहण किसी भी स्थान से केवल कुछ मिनटों तक ही दिखता है, वहीं चन्द्र ग्रहण की अवधि कुछ घंटों की होती है। इसके अतिरिक्त चन्द्र ग्रहण को सूर्य ग्रहण के विपरीत किसी विशेष सुरक्षा उपकरण के बिना नंगी आंखों से भी देखा जा सकता है, क्योंकि चन्द्र ग्रहण की उज्ज्वलता पूर्ण चन्द्र से भी कम होती है। इस वर्ष संवत 2074 माघ सुदी पूर्णिमा खग्रास ग्रस्त उदित चंद्रग्रहण 31/1/2018 बुधवार को चंद्रग्रहण सुबह 8: 21 मिनट बजे से मान्य तथा ग्रहण का स्पर्श- प्रारंभ काल संयम 5 घंटा 21 मिनट से तथा मोक्ष शुद्धि काल रात्रि 8 घंटा 45 मिनट पर स्पष्ट है। यह इस साल का पहला चंद्र ग्रहण होगा जिसकी समयावधि सायं 17:57:56 से रात्रि 20:41:10 बजे तक रहेगी। यह चंद्र ग्रहण उत्तर पूर्वी यूरोप, एशिया, ऑस्ट्रेलिया, उत्तर पश्चमी अफ्रीका, नॉर्थ अमेरिका, उत्तर पश्चमी साउध अमेरिका, पेसिफिक, अटलांटिक, हिन्द महासागर, आर्कटिक और अंटार्कटिका दिखाई देगा और भारत में भी इसकी दृश्यता रहेगी। भारतीय वैदिक ज्योतिष के अनुसार यह चंद्रग्रहण अश्लेषा नक्षत्र तथा कर्क राशि में लग रहा है। अश्लेषा बुध का नक्षत्र है इसलिए इस नक्षत्र से संबंधित राशि के लोगों के लिए यह ग्रहण समस्याएं उत्पन्न कर सकता है। चूंकि प्रत्येक राशि पर ग्रहण का प्रभाव भिन्न-भिन्न होता है, इसलिए कुछ राशि वालों के लिए यह ग्रहण कष्टकारी हो सकता है, तो कुछ राशि के लोगों के लिए कल्याणकारी भी हो सकता है। ==================================================================== किस समय लगेगा इस चंद्रग्रहण का सूतक? प्रिय पाठकों/मित्रों, ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की 31 जनवरी 2018 को लगने वाला चंद्र ग्रहण जो कि पूर्ण चंद्रग्रहण है। चंद्रोदय के साथ आरंभ होगा। इस दिन चंद्रमा 17:58 बजे उदय होंगे। 20:41:10 बजे चंद्र ग्रहण की समाप्ति होगी। इस चंद्र ग्रहण की अवधि लगभग 2 घंटे 41 मिनट 10 सैकेंड की रहेगी। चंद्रग्रहण हालांकि 31 जनवरी को चंद्रोदय के समय 17:58 बजे से आरंभ होगा लेकिन लेकिन इसका सूतक का समय प्रात: 7 बजकर 3 मिनट और 35 सैकेंड पर आरंभ हो जायेगा। जो कि रात्रि 08 बजकर 41 मिनट और 10 सैकेंड तक रहेगा। बच्चों एवं बुजूर्गों के लिये सूत्तक मध्यरात्रि 12 बजकर 40 मिनट और 27 सैकेंड से आरंभ होकर ग्रहण समाप्ति के समय तक रहेगा। ===================================================================== जानिए उज्जैन में सूतक का समय-- सूतक प्रारम्भ - ०७:०३:३५ सूतक समाप्त - २०:४१:१० बच्चों, बृद्धों और अस्वस्थ लोगों के लिये सूतक प्रारम्भ - १२:४०:२७ बच्चों, बृद्धों और अस्वस्थ लोगों के लिये सूतक समाप्त - २०:४१:१० ========================================================================== जानिए उज्जैन में इस खग्रास चन्द्र ग्रहण का समय-- चन्द्र ग्रहण प्रारम्भ (चन्द्रोदय के साथ) - १८:१२:३५ चन्द्र ग्रहण समाप्त - २०:४१:१० चन्द्रोदय - १८:१२:३५ स्थानीय ग्रहण की अवधि - ०२ घण्टे २८ मिनट्स ३५ सेकण्ड्स उपच्छाया से पहला स्पर्श - १६:२१:१५ प्रच्छाया से पहला स्पर्श - १७:१८:२७ खग्रास प्रारम्भ - १८:२१:४७ परमग्रास चन्द्र ग्रहण - १८:५९:५० खग्रास समाप्त - १९:३७:५१ प्रच्छाया से अन्तिम स्पर्श - २०:४१:१० उपच्छाया से अन्तिम स्पर्श - २१:३८:२६ खग्रास की अवधि - ०१ घण्टा १६ मिनट्स ०४ सेकण्ड्स खण्डग्रास की अवधि - ०३ घण्टे २२ मिनट्स ४३ सेकण्ड्स उपच्छाया की अवधि - ०५ घण्टे १७ मिनट्स ११ सेकण्ड्स चन्द्र ग्रहण का परिमाण - १.३२ उपच्छाया चन्द्र ग्रहण का परिमाण - २.२९ ==================================================================================== राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में (कोटा,बूंदी,बारां और झालावाड में) ग्रहण का स्पर्श शाम 05:18 बजे से होगा और मोक्ष शुद्धि काल रात 08:41 बजे तक रहेगा। ======================================================================================== ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री से जानिए इस चंद्र ग्रहण का सभी राशि पर होने वाले प्रभाव को - मेष: खर्च बढ़ेगा (वृद्धि ) होगी। वृषभ: सभी तरह से शुभ की संभावना। नौकरी और व्यापार में उन्नति होगी। मित्रों और प्रियजनों के साथ अच्छा समय व्यतीत करेंगे। मिथुन: धन हानि हो सकती है। अधिक यात्रा करने की वजह से घर से दूर रहना पड़ सकता है। सेहत का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि मानसिक अवसाद के शिकार हो सकते हैं। कर्क: शारीरिक कष्ट से समस्या हो सकती है। गुप्त रोग होने की भी संभावना। वाहन सावधानी से चलाएं। तनाव मुक्त रहने के लिए स्वयं को अपने कार्य में व्यस्त रखें। सिंह: वाद विवाद संभव |बेवजह की बातों से मानसिक चिंता बढ़ सकती है, इसलिए व्यर्थ ही किसी बात का तनाव ना लें। धन हानि होने की संभावना है। कुटुंब परिवार में कुछ समस्याएं उत्पन्न हो सकती है या सदस्यों के बीच मनमुटाव हो सकता है। कन्या: अचानक धन लाभ होगा और विभिन्न प्रकार के भौतिक सुखों का आनंद मिलेगा। साहस और परामक्रम में वृद्धि होगी। छोटी दूरी की यात्रा की संभावना है। भाई-बहन अच्छा समय व्यतीत करेंगे। तुला: शारीरिक विकारों से परेशानी बढ़ सकती है। किसी बात का भय बना रह सकता है। जीवन में संघर्ष बढ़ेगा। पारिवारिक जीवन में भी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। वृश्चिक: किसी बात की चिंता करने से आप स्वयं को तनावग्रस्त महसूस करेंगे। प्रेम संबंधों में समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। बेवजह के विवादों से बचने की कोशिश करें। पढ़ाई-लिखाई में अड़चनें आ सकती हैं। धनु: विरोधियों से चुनौती मिल सकती है, वे कई तरह की समस्या उत्पन्न करेंगे। आर्थिक जीवन सामान्य रहेगा। धन लाभ के साथ-साथ खर्च भी बढ़ेंगे। किसी कानूनी मामले से परेशानी हो सकती है। मकर: सावधानी बरतें | आपको वैवाहिक जीवन में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जीवनसाथी के साथ मतभेद होने की संभावना है। बिजनेस पार्टनर के साथ भी किसी बात को लेकर टकराव या विवाद हो सकता है। कुंभ: इस ग्रहण के प्रभाव स्वरूप शुभ योग बनाने की संभावना है। मीन: मन वाणी को शांत रखें | किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए आपको अत्यधिक प्रयास करने होंगे। आपकी परेशानी में वृद्धि होगी। =========================================================================== क्या होगा इस चन्द्र ग्रहण का प्रतिफल एवं विवरण--- पंडित दयानंद शास्त्री के अनुसार इस चन्द्र ग्रहण के दिन वार-बुधवार, तिथी - माघ पूर्णिमा और कर्क राशि पर ग्रहण होने से अच्छी बारिश के योग बनेंगे। जनता जागरूक होगी और सत्ता में परिवर्तन संभव है। साधु, संतों, पंडित, शिक्षार्थी, बुजुर्ग व्यक्ति के लिए कष्टकारी रहेगा। सोना-चांदी, पीतल, गुड़, चीनी, गेहूं में तेजी का रूख होगा। वहीं अराजकता, भूकंप, जातिगत आंदोलन, सुनामी होने की आशंका बन रही है। जब सूर्य और पृथ्वी के बीच में राहु व चन्द्रमा की छाया आ जाती है और जिस भाग में यह छाया पड़ती है उस जगह ऊर्जा का संचार कम होता है। ग्रहण के दौरान जो छाया मोटी होती है वह राहु तथा जो बारीक छाया होती है वह केतु कहलाती है। यानि छाया के असर से होने वाले दुष्प्रभाव को ग्रहण कहा जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की यह सर्व ग्रास खग्रास संज्ञा का प्रतीक होगा तथा यह चंद्रग्रहण पुष्य आश्लेषा नक्षत्र एवं कर्क राशि पर चरितार्थ होगा अतः इन राशि वालों को ग्रहण का दर्शन नहीं करना चाहिए एवं वृषभ, कन्या ,तुला एवं कुंभ राशि हेतु दर्शन करना सुखद है तथा मेष, कर्क, सिंह एवं धनु राशि हेतु दर्शन करना योग्य नहीं है | मिथुन, वृश्चिक, मकर और मीन राशि हेतु सामान्य मध्यम फलद रहेगा । वेसे भी ग्रहण के दौरान ज्यों ही ब्रह्मांड में घटना के साथ ऊर्जा की कमी होती है तो प्रत्येक जीव किसी न किसी प्रकार से प्रभावित होता है। ================================================================================== चंद्र ग्रहण ख़त्म होने के बाद क्या करें ?? ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक चंद्र ग्रहण ख़त्म होने के बाद स्नान के बाद नए वस्त्र पहनने चाहिए। और ग्रहण के वक्त पहने हुए कपड़े दान कर देने चाहिए। ऐसा करने शुभ माना जाता है। साथ ही अपने पितरो को दान करना चाहिए। ऐसा करने से घर में खुशहाली बनी रहती है। साथ जी ग्रहण काल में तुलसी के पौधे को नहीं छूना चाहिए। ऐसा करना शुभ नहीं माना जाता। ==================================================================================== चंद्र ग्रहण के बाद पूजा पाठ का विशेष महत्त्व -- चंद्र ग्रहण के बाद किसी धार्मिक स्थल पर जाना बहुत ही शुभ माना जाता है। और साथ ही इस समय भगवान् शिव की पूजा करना बहुत ही शुभ माना जाता है। ग्रहण काल ख़त्म होने के बाद घर में देवी देवताओं की मूर्तियों को गंगाजल छिड़क कर शुद्ध करना चाहिए। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की ज्योतिष शास्त्र के मुताबिक ग्रहण काम में घर में नकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है इसलिए ग्रहण ख़त्म होने बाद घर की साफ सफाई जरूर करें। और साफ सफाई ख़त्म होने के बाद घर में धुप (गूगल/कपूर इत्यादि) भी जलाएं। ऐसा करने से घर से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होगा और घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होगा। ======================================================================================= जानिए ग्रहण में क्या करें, क्या न करें? ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की सूर्य हो या चंद्र ग्रहण, दोनों ही अपने बुरे प्रभाव के लिए जाने जाते हैं। ना केवल शास्त्रीय दृष्टि सेम वरन् साइंस ने भी ग्रहण की वजह से होने वाले बुरे प्रभावों को माना है। ग्रहण के दौरान कुछ सावधनियां बरतनी जरूरी हैं यह वैज्ञानिकों ने भी माना है, क्यूंकि ग्रहण के दौरान निकलने वाली तरंगे हमें हानि पहुंचा सकती हैं। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की सूर्यग्रहण हो या चंद्रग्रहण, सूतक लगने के बाद से और सूतक समाप्त होने तक भोजन नहीं करना चाहिये। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की ग्रहण के वक्त पत्ते, तिनके, लकड़ी और फूल नहीं तोड़ने चाहिए। ग्रहण के वक्त बाल नहीं कटवाने चाहिये। ग्रहण के सोने से रोग पकड़ता है किसी कीमत पर नहीं सोना चाहिए। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की ग्रहण के वक्त संभोग, मैथुन, आदि नहीं करना चाहिये। ग्रहण के वक्त दान करना चाहिये। इससे घर में समृद्धि आती है। कोइ भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिये और नया कार्य शुरु नहीं करना चाहिये। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की अगर संभव हो सके तो पके हुए भोजन को ग्रहण के वक्त ढक कर रखें, साथ ही उसमें तुलसी की पत्ती डाल दें। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की तुलसी का पौधा शास्त्रों के अनुसार पवित्र माना गया है। वैज्ञानिक रूप से भी यह सक्षम है, इसमें मौजूद एंटी ऑक्सीडेंट आसपास मौजूद दूषित कणों को मार देते हैं। इसलिए खाद्य पदार्थ में डालने से उस भोजन पर ग्रहण का असर नहीं होता। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण के समय संयम रखकर जप-ध्यान करने से कई गुना फल होता है। श्रेष्ठ साधक उस समय उपवासपूर्वक ब्राह्मी घृत का स्पर्श करके 'ॐ नमो नारायणाय' मंत्र का आठ हजार जप करने के पश्चात ग्रहणशुद्धि होने पर उस घृत को पी ले। ऐसा करने से वह मेधा (धारणशक्ति), कवित्वशक्ति तथा वाक् सिद्धि प्राप्त कर लेता है। सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण के समय भोजन करने वाला मनुष्य जितने अन्न के दाने खाता है, उतने वर्षों तक 'अरुन्तुद' नरक में वास करता है। सूर्यग्रहण में ग्रहण चार प्रहर (12 घंटे) पूर्व और चन्द्र ग्रहण में तीन प्रहर (9) घंटे पूर्व भोजन नहीं करना चाहिए। बूढ़े, बालक और रोगी डेढ़ प्रहर (साढ़े चार घंटे) पूर्व तक खा सकते हैं। ग्रहण-वेध के पहले जिन पदार्थों में कुश या तुलसी की पत्तियाँ डाल दी जाती हैं, वे पदार्थ दूषित नहीं होते। पके हुए अन्न का त्याग करके उसे गाय, कुत्ते को डालकर नया भोजन बनाना चाहिए। ग्रहण वेध के प्रारम्भ में तिल या कुश मिश्रित जल का उपयोग भी अत्यावश्यक परिस्थिति में ही करना चाहिए और ग्रहण शुरू होने से अंत तक अन्न या जल नहीं लेना चाहिए। ग्रहण के स्पर्श के समय स्नान, मध्य के समय होम, देव-पूजन और श्राद्ध तथा अंत में सचैल (वस्त्रसहित) स्नान करना चाहिए। स्त्रियाँ सिर धोये बिना भी स्नान कर सकती हैं। ग्रहण के समय सोने से रोगी, लघुशंका करने से दरिद्र, मल त्यागने से कीड़ा, स्त्री प्रसंग करने से सूअर और उबटन लगाने से व्यक्ति कोढ़ी होता है। गर्भवती महिला को ग्रहण के समय विशेष सावधान रहना चाहिए। तीन दिन या एक दिन उपवास करके स्नान दानादि का ग्रहण में महाफल है, किन्तु संतानयुक्त गृहस्थ को ग्रहण और संक्रान्ति के दिन उपवास नहीं करना चाहिए। भगवान वेदव्यासजी ने परम हितकारी वचन कहे हैं- सामान्य दिन से चन्द्रग्रहण में किया गया पुण्यकर्म (जप, ध्यान, दान आदि) एक लाख गुना और सूर्यग्रहण में दस लाख गुना फलदायी होता है। यदि गंगाजल पास में हो तो चन्द्रग्रहण में एक करोड़ गुना और सूर्यग्रहण में दस करोड़ गुना फलदायी होता है। ग्रहण के समय गुरुमंत्र, इष्टमंत्र अथवा भगवन्नाम-जप अवश्य करें, न करने से मंत्र को मलिनता प्राप्त होती है। ग्रहण के अवसर पर दूसरे का अन्न खाने से बारह वर्षों का एकत्र किया हुआ सब पुण्य नष्ट हो जाता है। भूकंप एवं ग्रहण के अवसर पर पृथ्वी को खोदना नहीं चाहिए। ======================================================================== आइये जाने ग्रहण के वैज्ञानिक कारण-- प्रिय पाठकों/मित्रों,सूर्य ग्रहण हो या फिर चंद्र ग्रहण, खगोलविदों के लिये दोनों ही आकर्षण का केंद्र होते हैं। रही बात आम लोगों की, तो तमाम लोग इसे एक प्राकृतिक घटना के रूप में देखना चाहते हैं, तो बहुत लोग ऐसे भी हैं, जो इसे धर्म से जोड़ते हैं। खास कर हिंदू धर्म को मानने वाले लोग। जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है तब सूर्य कुछ समय के लिए चंद्रमा के पीछे छुप जाता है। इसी स्थिति को वैज्ञानिक भाषा में सूर्य ग्रहण कहते हैं। ग्रहण को हिन्दू धर्म में शुभ नहीं माना जाता है। हालांकि ये एक भोगौलिक घटना है, जिस में इतना परेशान होने की जरूरत नहीं है। लेकिन ज्योतिषियों के मुताबिक इन ग्रहणों का आपके जीवन पर प्रभाव पड़ता है इसी कारण ग्रहण के वक्त कुछ जरुरी सावधानियां बरतनी चाहिए। हमारे देश में वैदिक काल से ही ग्रहण से संबंधित कथाएं और किवदंतियाँ प्रचलन में रही हैं। वर्तमान में भी लोग इन पौराणिक कथाओं को सत्य मानते हैं। ग्रहण के एक-दो दिन पहले से ही टीवी और समाचार पत्रों के माध्यम से फलित ज्योतिषी अपना कूपमंडूक सुनाते रहते हैं।असल में ग्रहण के समय पुरोहित, ज्योतिषी, पंडे आदि दान-दक्षिणा इत्यादि के बहाने लोगों के मन में भय उत्पन्न करने की मंशा रखते हैं और उनका अपने तरीके से उपयोग तो करते ही हैं। प्रिय पाठकों/मित्रों, ज्योतिषाचार्य पंडित दयानंद शास्त्री ने बताया की चंद्र ग्रहण केवल पूर्णमासी पर ही लगता है और सूर्य ग्रहण अमावस पर ही दिखेगा। पौराणिक काल से राहू और केतु को समुद्र मंथन से जोड़ा गया है और ज्योतिष इन्हें छाया ग्रह मानता है। भूकंप आने व प्राकृतिक आपदाओं की भविष्यवाणी भी ऐसी खगोलीय घटनाओं से की जाती है। सूर्य ग्रहण के समय वैज्ञानिक, सूर्य को नंगी आखों से न देखने की सलाह क्यों देते हैं यदि यह केवल मात्र खगोलीय घटना ही है। भारत की हर परंपरा के पीछे वैज्ञानिक कारण रहे हैं। आज वैज्ञानिक सुपर कम्प्यूटर के माध्यम से ग्रहण लगने और समाप्त होने का समय बताते हैं जबकि महाभारत काल में तो हमारे वैज्ञानिक ऋषि-मुनियों एवं गणितज्ञों ने त्रिकोणमिति अर्थात ट्रिग्नोमीट्री जो भारत की देन है की सहायता से 5000 साल पहले ही बता दिया था कि महाभारत युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र में पूर्ण सूर्य ग्रहण लगेगा। पूर्ण सूर्य ग्रहण लगने से जब भरी दोपहरी में अंधकार छा जाता है तो पक्षी भी अपने घोंसलों में लौट आते हैं। यह पिछले सूर्य ग्रहण के समय लोग देख चुके हैं और पूरे विश्व के वैज्ञानिक भी। तो ग्रहण का प्रभाव हर जीव जन्तु, मनुष्य, तथा अन्य ग्रहों पर पड़ता है। गुरुत्वाकर्षण घटने या बढऩे से धरती पर भूकंप आने की संभावना ग्रहण के 41 दिन पहले या बाद तक रहती है।
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01-01-1970 Blog

जानिए कैसे पूर्वजन्म के दोष आपके जीवन में परेशानी का कारण बनते हैं ??

जानिए कैसे पूर्वजन्म के दोष आपके जीवन में परेशानी का कारण बनते हैं ?? प्रिय पाठकों/मित्रों, वैदिक ज्योतिष अनुसार किसी भी मनुष्य की मृत्यु के समय जो कुंडली बनती है, उसे पुण्य चक्र कहते हैं. इससे मनुष्य के अगले जन्म की जानकारी होती है। मृत्यु के बाद उसका अगला जन्म कब और कहां होगा, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। सुप्रसिद्ध ज्योतिष ग्रंथ जातक-पारिजात में मृत्युपरांत गति के बारे में बताया गया है. यदि मरण काल में लग्न में गुरु हो तो जातक की गति देवलोक में, सूर्य या मंगल हो तो मृत्युलोक, चंद्रमा या शुक्र हो तो पितृलोक और बुध या शनि हो तो नरक लोक में जाता है. यदि बारहवें स्थान में शुभ ग्रह हो, द्वादशेश बलवान होकर शुभ ग्रह से दृष्टि होने पर मोक्ष प्राप्ति का योग होता है. यदि बारहवें भाव में शनि, राहु या केतु की युति अष्टमेश के साथ हो, तो जातक को नरक की प्राप्ति होती है. ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि जब जन्म कुंडली में गुरु और केतु का संबंध द्वादश भाव से होने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके साथ साथ जन्म पत्रिका में गुरु, शनि और राहू की स्थिति आत्माओं का सम्बन्ध पूर्व कर्म के कर्मो से प्राप्त फल या प्रभाव इस तरह होता हैं :- 1. गुरु यदि लग्न में हो तो पूर्वजों की आत्मा का आशीर्र्वाद अथवा दोष दर्शाता है। अकेले में या पूजा करते वक्त उनकी उपस्थिति का आभास होता है। ऐसे व्यक्ति कों अमावस्या के दिन दूध का दान अवश्य करना चाहिए। 2. दूसरे अथवा आठवें स्थान का गुरु दर्शाता है कि व्यक्ति पूर्व जन्म में सन्त या सन्त प्रकृति का या और कुछ अतृप्त इच्छाएं पूर्ण न होने से उसे फिर से जन्म लेना पड़ा। ऐसे व्यक्ति पर अदृश्य प्रेत आत्माओं के आशीर्वाद रहते है। अच्छे कर्म करने तथा धार्मिक प्रवृति से समस्त इच्छाएं पूर्व होती हैं। ऐसे व्यक्ति सम्पन्न घर में जन्म लेते है। उत्तरार्ध में धार्मिक प्रवृत्ति से पूर्ण जीवन बिताते हैं। उनका जीवन साधारण परंतु सुखमय रहता है और अन्त में मौत को प्राप्त करते है। 3. गुरु तृतीय स्थान पर हो तो यह माना जाता है कि पूर्वजों में कोई स्त्री सती हुई है और उसके आशीर्वाद से सुखमय जीवन व्यतीत होता है किन्तु शापित होने पर शारीरिक, आर्थिक और मानसिक परेशानियों से जीवन यापन होता है। कुल देवी या मॉ भगवती की आराधना करने से ऐसे लोग लाभान्वित होते हैं। 4. गुरु चौथे स्थान पर होने पर जातक ने पूर्वजों में से वापस आकर जन्म लिया है। पूर्वजों के आशीर्वाद से जीवन आनंदमय होता है। शापित होने पर ऐसे जातक परेशानियों से ग्रस्त पाये जाते हैं। इन्हें हमेशा भय बना रहता है। ऐसे व्यक्ति को वर्ष में एक बार पूर्वजों के स्थान पर जाकर पूजा अर्चना करनी चाहिए और अपने मंगलमय जीवन की कामना करना चाहिए। 5. गुरु नवें स्थान पर होने पर बुजुर्गों का साया हमेशा मदद करता रहता हैं। ऐसा व्यक्ति माया का त्यागी और सन्त समान विचारों से ओतप्रोत रहता है। ज्यों-ज्यों उम्र बढ़ती जाती है वह बली, ज्ञानी बनता जाएगा। ऐसे व्यक्ति की बददुआ भी नेक असर देती है। 6. गुरु का दसवें स्थान पर होने पर व्यक्ति पूर्व जन्म के संस्कार से सन्त प्रवृत्ति, धार्मिक विचार, भगवान पर अटूट श्रळा रखता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि यदि किसी जन्म कुंडली में दसवें, नवें या ग्यारहवें स्थान पर शनि या राहु भी है, तो ऐसा व्यक्ति धार्मिक स्थल, या न्यास का पदाधिकारी होता है या बड़ा सन्त। वह अपनी दुष्ट प्रवृत्ति के कारण बेइमानी, झूठ, और भ्रष्ट तरीके से आर्थिक उन्नति करता है किन्तु अन्त में भगवान के प्रति समर्पित हो जाता हैं । 7. ग्यारहवें स्थान पर गुरु बतलाता है कि व्यक्ति पूर्व जन्म में तंत्रा मंत्रा गुप्त विद्याओं का जानकार या कुछ गलत कार्य करने से दूषित प्रेत आत्माएं परिवारिक सुख में व्यवधान पैदा करती है। उसे मानसिक अशान्ति हमेशा रहती है। राहू की युति से विशेष परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे व्यक्ति को मां काली की आराधना करना चाहिए और संयम से जीवन यापन करना चाहिए। 8. बारहवें स्थान पर गुरु, गुरु के साथ राहु या शनि का योग पूर्वजन्म में इस व्यक्ति द्वारा धार्मिक स्थान या मंदिर तोडने का दोष बतलाता है और उसे इस जन्म में पूर्ण करना पडता है। ऐसे व्यक्ति को अच्छी आत्माएं उदृश्यरुप से साथ देती है। इन्हें धार्मिक प्रवृत्ति से लाभ होता है। गलत खान-पान से तकलीफों का सामना करना पड़ता है।
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शनि का महापरिवर्तन का आपकी राशि पर क्‍या पड़ेगा असर...

जानिए क्या होगा आपकी राशि पर प्रभाव ?? (7 जनवरी 2018 को शनि देव उदय होने का ) शनि का महापरिवर्तन का आपकी राशि पर क्‍या पड़ेगा असर... प्रिय पाठकों/मित्रों, शनि को न्याय के देवता कहा जाता हैं, न्याय का नाता धर्म के पालन से है और अच्छे-बुरे कर्म न्याय का आधार होते हैं. मान्यता है कि शनि प्रत्येक मनुष्य को उसके पाप-पुण्य और कर्मों के आधार पर ही कृपा करते हैं एवं दण्डित भी करते है | ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की शनि को हमेशा से ही क्रोधी प्रवृत्ति का माना जाता है. जब शनि की बात हो तो वह कौन से भाव में तथा किस धातु के पाद में है यह जानना अति आवश्यक हो जाता है. क्योंकि ये चीजे आपके जीवन में उतार चढाव से संबधित हैं | शनि ग्रह जब सूर्य के अत्यधिक निकट यानी 16 डिग्री से कम दूरी पर होता है, तब उसे अस्त माना जाता है। इससे ऊपर की स्थिति में शनि ग्रह का उदय माना जाता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार शनि देव अच्छे कर्मों का अच्छा और बुरे कर्मों का बुरा फल देते है। कई जगहों पर कहा गया है कि शनि की कुदृष्टि मनुष्य के लिए बहुत हानिकारक होती है। जबकी अगर मनुष्य पर उनकी कृपा हो जाए तो जीवन सुखमय हो जाता है।पूरे आकाशमंडल में शनि एक ऐसा ग्रह है जिसके प्रकोप के नाम से भी व्‍यक्ति थर्र थर्र कांप उठता है। कहा जाता है कि शनि देव सबसे शक्तिशाली होते है। जब शनि प्रत्येक व्यक्ति की राशि में आते हैं तो लोगों को एक्सीडेंट, धन की हानि, घर में अत्यन्त कलेश जैसी कई दिक्कतें झेलनी पड़ती है। आमतौर पर लोग शनि के प्रकोप से बचने के लिए कई तरह के उपाय करते हैं जैसे शनिवार को तेल का दिया जलाना, हनुमान चालीसा करना आदि। ऐसा माना जाता है कि शनिदेव कर्मों के हिसाब से अच्छा या बुरा फल देते है। धर्म ग्रंथों और शास्त्रों के अनुसार शनि देव को न्याय का देवता कहा जाता है। माना जाता है मनुष्य के कर्मों के हिसाब से न्याय करते है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की पिछले वर्ष 2017 में शनि गुरूवार दिनांक 26 अक्टूर 2017 को शाम 6 बजकर 11 मिनट पर धनु राशि में प्रवेश कर गए थे। 2018 में पूरे साल भर यह इसी राशि में गोचर करेंगे। वर्तमान में शनि केेतू के नक्षत्र मूल में भ्रमणशील हैं। 4 दिसंबर 2017 को सोमवार सुबह 8.32 मिनट पर शनि अस्त हो गए थे तथा सोमवार दिनांक 8 जनवरी 2018 को शाम 7 बजकर 50 मिनट पर शनि उदय होंगे। शनि का अस्तकाल सही मायनों में देश, समाज और राजनीति के लिए बड़ी भारी समस्याओं का संदेश दे रहा है। 2018 में शनि देव अपनी वक्र अवस्था में भी आएंगे। भारतीय पंचांग के अनुसार शनिदेव बुधवार 18 अप्रैल 2018 को प्रात: 7 बजकर 10 मिनट पर वक्र अवस्था में चले जाएंगे। उस समय शनि पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के पहले चरण से वक्र होकर गुरूवार दिनांक 6 सितंबर 2018 को शाम 5 बजकर 2 मिनट पर वक्र अवस्था में रहेंगे। इस अवस्था में शनि पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र से पुन: मूल नक्षत्र में भ्रमण करेंगे। शनि का ये वक्र भ्रमण भारतीय राजनीति के लिए विस्मयकारी सिद्ध हो सकता है। ऐसी स्थिती में राजनितिक चुनावों के दरमियान सत्ता रूढ़ दलों को भारी हानि उठानी पड़ सकती है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इस वर्ष होने वाले कर्नाटक के चुनाव में भारी उलट-फेर होने की संभावना है। ऐसी अवस्था में सत्ता रूढ़ दलों को हार का सामना करना पड़ सकता है। शनि और राहु चतुर वर्ग समुदाय में दलितों का प्रतिनिध्त्व करते हैं। शनि के वक्र काल में दलितों द्वारा सत्ता पक्ष के विरूद्ध बहुत बड़े विरोध का सामना करना पड़ सकता है। शनि के वक्र और अस्त काल में कच्चे तेल में भारी उछाल होने की संभावना है। जिससे महंगाई अत्यधिक बढ़ सकती है तथा जिसका पूरा भार जनता पर पड़ेगा। मंहगाई बढ़ने से जनता के क्रोध का प्रभाव सत्ता रूढ़ दलों पर पड़ेगा। ======================================================================= कल 7 जनवरी 2018 (रविवार )को शनि देव उदय होने जा रहे हैं | इस रविवार ( 7 जनवरी 2018 ) के दिन सुबह के समय 5 बजकर 55 मिनट पर शनि देव धनु और केतु वाले मूल नक्षत्र में प्रवेश कर रहे हैं। शनि देव का ये उदय कई राशियों को प्रभावित करेगा। इसके साथ साथ प्रमुख रूप से चमड़ा, तेल, पेट्रो पदार्थों का व्यापार बढ़ेगा। शनि के उदय होने पर वर्ष भर सभी तरह के व्यापार में बढ़ोतरी होगी। आठ राशियों के लिए यह शुभ फलदायक रहेगा। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की शनि के इस उदय का कई राशियों को लाभ मिलेगा, इनमें से 5 राशियों को विशेष लाभ होगा। इन 5 राशियों में मेष, मिथुन, सिंह, तुला और कुंभ राशि शामिल हैं।हालांकि शनि की उदय तिथि को लेकर कुछ ज्योतिषी मान रहे हैं शनि का उदय नो जनवरी को होगा। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार यहाँ ध्यान देने वाली बात यह हैं की गत चार दिसंबर 2017 से शनि अस्त था। इसका प्रभाव स्वरूप ही शीतलहर बढ़ रही है। व्यापार में भी ठहराव चल रहा है। देश में हिंसक और आगजनी की घटनाओ में अचानक से हुयी वृद्धि इसी का परिणाम थी |अब शनि ग्रह आज 7 जनवरी 2018 (रविवार ) के दिन सुबह के समय 5 बजकर 55 मिनट पर पर उदय हो गए हैं । ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री से जानते हैं कि शनि देव के उदय होने का अन्य राशियों पर क्‍या प्रभाव पड़ेगा-- मेष रा‍शि कार्यक्षेत्र में उन्‍नति के योग बनेंगें। आर्थिक लाभ की प्रबल संभावना है। मेष राशि वाले लोगों की जिन्दगी की आर्थिक स्थिति में जल्दी ही कुछ अच्छी खबरों के साथ सुधार होगा. अगर आप व्यपार करते है तो पैसों से जुड़ा कोई बड़ा सौदा हो सकता है. अगर आप काम की शुरुवात की स्थिति में है तो छोटे और सरल काम से शुरूआत करेंगे, तो ज्यादा सफलता मिल सकती है. आपको लोगों से पूरा समर्थन मिलेगा |भाग्‍योदय होगा एवं धार्मिक कार्यों के प्रति रूचि बढ़ेगी। पदोन्‍नति के उत्तम योग हैं। वृषभ राशि कामकाज में रूकावटें आ सकती हैं। आर्थिक मामलों में आ रही परेशानियों को शांत होकर सुलझाएं। स्‍वास्‍थ्‍य का ध्‍यान रखें। वाहन चलाते समय सावधानी बरतें। मिथुन राशि भाग्‍य पक्ष मजबूत होगा। इस राशि वालों को भाइयों और दोस्तों से भी सहयोग मिलेगा. गोचर कुंडली में चंद्रमा पांचवें भाव में है. इस राशि के लोगों को अचानक से धन लाभ हो सकता है. आप को ऑफिस और परिवार में कुछ बदलाव भी महसूस हो सकते हैं |व्‍यापार में साझेदारी में किसी नए काम की शुरुआत कर सकते हैं। कार्यों में सफलता के योग बन रहे हैं। कर्क राशि रोग, ऋण और शत्रु समाप्‍त होंगें। चुनौतियों का सामना करना पड़ स‍कता है। नाना और मामा पक्ष से विशेष मान-सम्‍मान की प्राप्‍ति होगी। मुश्किल कार्य में भी सफलता मिलेगी। सिंह राशि आर्थिक क्षेत्र में आ रही समस्‍याओं को शांति और सहयोग से हल करें। संतान को विदेश जाने के अवसर मिलेंगें। आर्थिक लाभ प्राप्‍त होगा। कन्‍या राशि सामाजिक सक्रियता में वृद्धि के योग बने हुए हैं। माता के स्‍वास्‍थ्‍य में सुधार आएगा। सभी प्रकार के सुखों में वृद्धि होगी। तुला राशि तुला राशि वालों का चंद्रमा आपकी ही राशि में रहेगा. इससे आप के ऊपर जो पहले से ही पैसे का दबाव होगा वो फुर हो जायेगा. पैसों के क्षेत्र में कुछ अच्छे मौके आज आपको मिल सकते हैं. इसकी के साथ आपको कुछ खास अनुभूतियां और पूर्वाभास भी होगा और मन की चिंताएं खत्म होंगी |भाग्‍यवर्द्धक यात्रा होगी। समाज में मान-सम्‍मान बढ़ेगा। पराक्रम बढ़ेगा और भाईयों का सहयोग आपको प्राप्‍त होगा। वृश्चिक राशि आर्थिक पक्ष मजबूत होगा। संपत्ति, वाहन या मकान आदि में निवेश में सफलता मिलेगी। धन संग्रह का योग बन रहा है। धनु राशि भाई-बहन से जुड़े कार्यों में भागदौड़ रहेगी। कठिन परिश्रम के योग हैं। कार्यक्षेत्र में दबाव महसूस होगा। हिम्‍मत ना हारें। मकर राशि बाहरी क्षेत्रों में यात्रा आदि का योग बन रहा है। रोग, ऋण और शत्रु परास्‍त होंगें। किसी बड़े कार्य में धन खर्च होगा। पैसों का दुरुपयोग होगा। अनावश्‍यक खर्च पर लगाम लगाकर रखें। कुंभ राशि शनि देव के इस परिवर्तन से कुम्भ राशि के जातको के जीवन में अहम बदलाव आएगा. इस राशि के जातको जातकों को आमदनी के स्रोत में वृद्ध‍ि होगी व्यवसाय में बड़ा लाभ होने की संभवना बन रही है. रुके हुए धन के मिलने की संभवना है. मीन राशि कार्यक्षेत्र में वृद्धि के योग हैं। नए कार्य और व्‍यापार की योजना बना सकते हैं। पद-प्रतिष्‍ठा और पदोन्‍नति के योग बने हुए हैं। रोज़गार और व्‍यापार के उत्तम अवसर प्राप्‍त होंगें। ========================================================= ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री से जानते हैं शनि शांति के उपाय-- ----आप अपना कोई पुराना जूता शनिवार के दिन चौराहे पर रख दें। ----काले रंग की चिडिया खरीद कर उसे दोनों हाथों से आसमान में उड़ा दें। आपके सारे दुख और तकलीफें दूर हो जाएंगीं। ----लोहे का त्रिशूल महाकाल शिव, महाकाल भैरव या महाकाली मंदिर में अर्पित करें। ----शनि दोष के कारण विवाह में देरी आ रही है तो 250 ग्राम काली राई नए काले कपड़े में बांधकर पीपल के पेड़ की जड़ में रख दें और शीघ्र विवाह के लिए प्रार्थना करें। ----शनि को खुश करने के लिए हनुमान जी की उपासना करें। यदि न कर सकें तो प्रत्येक शनिवार को पीपल के पेड़ का स्पर्श कर उसे प्रणाम करें। ऐसा करने पर शनिदेव प्रसन्न होते हैं। ============================================= विशेष सावधानी -- ये उपाय शनिवार या अमावस्‍या के दिन करने से विशेष फल मिलेगा। इन दिनों के अलावा शनि देव की उपासना और उपाय शाम के समय ही करना चाहिए क्‍योंकि शनि देव का समय शाम का है।
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01-01-1970 Blog

क्या राहु, राजनीती में सफलता दिलाता हैं

क्या राहु, राजनीती में सफलता दिलाता हैं--- प्रिय पाठकों/मित्रों, वर्तमान में राजनीति एक ऐसा क्षेत्र बनता जा रहा है, जहाँ कम परिश्रम में भरपूर पैसा व प्रसिद्ध‍ि दोनों ही प्राप्त होते हैं। ढेरों सुख-सुविधाएँ अलग से मिलती ही है। और मजा ये कि इसमें प्रवेश के लिए किसी विशेष शैक्षणिक योग्यता की भी जरूरत नहीं होती। नीति कारक ग्रह राहु, सत्ता का कारक सूर्य, न्याय-प्रिय ग्रह गुरु, जनता का हितैषी शनि और नेतृत्व का कारक मंगल जब राज्य-सत्ता के कारक दशम भाव, दशम से दशम सप्तम भाव, जनता की सेवा के छठे भाव, लाभ एवं भाग्य स्थान से शुभ संबंध बनाए तो व्यक्ति सफल राजनीतिज्ञ बनता है। राजनीती एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्षेत्र है । और आज भारत की राजनीति अर्थात वैकुण्ठ की प्राप्ति के सामान है । राजनीती में सफलता के लिए मुख्य रूप से सूर्य, मंगल, गुरु, शनि और राहु कारक होते है ।। व्यक्ति सफल राजनीतिज्ञ बनेगा या नहीं ? इसका बहुत कुछ उसके जन्मकालिक ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करता है। अन्य व्यवसायों एवं करियर की भांति ही राजनीति में प्रवेश करने वालों की कुंडली में भी ज्योतिषीय योग होते हैं। कुंडली का दशम भाव राजनीती, सत्ता, अधिकार, सरकार से सम्बंधित भाव है ।। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की वैसे भी राजनीति दो शब्दों राज-नीति के योग से बना हुआ एक शब्द है जिसका सामान्य अर्थ है एक ऐसा राजा जिसकी नीतियां और राजनैतिक गतिविधियां इतनी परिपक्व और सुदृढ़ हों, जिसके आधार पर वह अपनी जनता का प्रिय शासक बन सके और अपने कार्यक्षेत्र में सम्मान और प्रतिष्ठा अर्जित करता हुआ उन्नति के चर्मात्कर्ष तक पहुंचे। राजनीति में पूर्णतया सफल केवल वही जातक हो सकता है जिसकी कुंडली में कुछ विशिष्ट धन योग, राजयोग एवं कुछ अति विशिष्ट ग्रह योग उपस्थित हों, क्योंकि एक सफल राजनेता को अधिकार, मान-सम्मान सफलता, रुतबा, धन शक्ति, ऐश्वर्य इत्यादि सभी कुछ अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। अतः एक सफल राजनेता की कुंडली में विशिष्ट ग्रह योगों का पूर्ण बली होना अति आवश्यक है क्योंकि कोई भी व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में तभी सफल होगा जब कुंडली में उपस्थित ग्रह योग उसका पूर्ण समर्थन करेंगे। चौथा भाव जनता से सम्बंधित भाव है तो पाचवां घर जातक की बुद्धि विवेक का है । दूसरा भाव वाणी का है राजनीति में भाषण देने की कला का अच्छा होने के लिए द्वितीय भाव अच्छा होना चाहिए ।। बुध ग्रह बुद्धि, सोच-समझ और बोलने की शक्ति का कारक है । बुद्धि, सोच-समझकर बोलना जैसे क्या और कैसे बोलना चाहिए यह कला बुध ही देता है ।। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की इन सभी ग्रहों और भावों का अनुकूल और मजबूत होना ही जातक को एक सफल राजनीतिज्ञ बनाता है । राजनीति एक बहुत ही बड़ा और उच्च अधिकारों और जनता के सहयोग का क्षेत्र होता है ।।जिसके लिये जरुरी है कुंडली में राजयोगो का होना । जितने ज्यादा केंद्र त्रिकोण के सम्बन्ध आपस में बनते है, कुण्डली में राजयोग उतना ही ज्यादा शक्तिशाली होता है ।।राजनीति में जाने के लिए भी कुंडली में कुछ विशेष ग्रहों का प्रबल होना जरूरी है। राहु को राजनीति का ग्रह माना जाता है। यदि इसका दशम भाव से संबंध हो या यह स्वयं दशम में हो तो व्यक्ति धूर्त राजनीति करता है। अनेक तिकड़मों और विवादों में फँसकर भी अपना वर्चस्व कायम रखता है। राहु यदि उच्च का होकर लग्न से संबंध रखता हो तब भी व्यक्ति चालाक होता है। राजनीति के लिए दूसरा ग्रह है गुरु- गुरु यदि उच्च का होकर दशम से संबंध करें, या दशम को देखें तो व्यक्ति बुद्धि के बल पर अपना स्थान बनाता है। ये व्यक्ति जन साधारण के मन में अपना स्थान बनाते हैं। चालाकी की नहीं वरन् तर्कशील, सत्य प्रधान राजनीति करते हैं। राजयोग के प्रभाव से जातक समाज में सम्मान का जीवन जीता है । जो जातक राजनीती में होते है, उनकी कुंडली में राजयोग होता ही है । इसी के प्रभाव से यह समाज में अपनी पहचान और उच्च स्तर का जीवन जीते है ।। सूर्य ग्रहों का राजा है, मंगल सेनापति, गुरु मंत्री एवं सर्वोत्कृष्ट सलाहकार, शनि जनता का कारक है तो राहु चलाकी, गुप्त षड्यंत्र और आज की वर्तमान राजनीति का बहुत ही महत्वपूर्ण कारक ग्रह है ।। सूर्य राजा, सफलता, सरकार का कारक होने से राजनीति में उच्च अधिकार और सफलता दिलाता है । मंगल बल और साहस का कारक है, यह जातक को हिम्मत देने का काम करता है ।।गुरु सही रास्ता दिखाने वाला है तो इसके इसी गुण के कारण राजनीती में सफल होने वाले जातक मंत्री आदि जैसे पद को प्राप्त करते है ।।शनि की अनुकूल स्थिति जातक को जनता से सहयोग दिलाती है । शनि के अनुकूल होने से राजनीती में जातक लोकप्रियता प्राप्त करता है ।। इसके अलावा दशम भाव या दशम भाव से बना गजकेसरी योग । दशम भाव में बैठा शुभ और बली राहु या शनि इन सभी का किसी अन्य योगकारक ग्रहों से सम्बन्ध होना राजनीति में सफलता के लिए शुभ होता है ।जन्म कुण्डली के दशम घर को राजनीति का घर कहते हैं। सत्ता में भाग लेने के लिए दषमेष और दशम भाव का मजबूत स्थिति में होना जरूरी है। दशम भाव में उच्च, मूल त्रिकोण या स्वराषिस्थ ग्रह के बैठने से व्यक्ति को राजनीति के क्षेत्र में बल मिलता है। गुरु नवम भाव में शुभ प्रभाव में स्थित हो और दषम घर या दश्मे ष का संबंध सप्तम भाव से हो तो व्यक्ति राजनीति में सफलता प्राप्त करता है। सूर्य राज्य का कारक ग्रह है अतः यह दशम भाव में स्वराशि या उच्च राशि में होकर स्थित हो और राहु छठे, दसवें व ग्यारहवें भाव से संबंध बनाए तो राजनीति में सफलता की प्रबल संभावना बनती है। इस योग में वाणी के कारक (द्वितीय भाव के स्वामी) ग्रह का प्रभाव आने से व्यक्ति अच्छा वक्ता बनता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री के अनुसार किसी भी जातक की लग्न कुण्डली में यह देखा जाता है कि दशम भाव अथवा दशम भाव के स्वामी ग्रह का सप्तम से सम्बंध होने पर जातक सफल राजनेता बनता है। क्योंकि सांतवा घर दशम से दशम है इसलिये इसे विशेष रुप से देखा जाता है साथ ही यह भाव राजनैतिक पद दिलाने में सहायक माना गया है। छठवा घर नौकरी या सेवा का घर होता है यदि इस घर का संबंध दशम भाव या दशमेश से होता है तो व्यक्ति जनता की सेवा करते हुए बडा नेता बनता है या नेता बन कर जनता की सेवा करता है। अब यही संकेत वर्ग कुण्डलियां भी दे रहीं हों तो समझों कि व्यक्ति राजनेता जरूर बनेगा। इसमें नवांश और दशमांश नामक वर्ग कुण्डलियां मुख्य रूप से विचारणीय होती हैं। यदि जन्म कुण्डली के राजयोगों के सहायक ग्रहों की स्थिति नवाशं कुण्डली में भी अच्छी हो तो परिणाम की पुष्टि हो जाती है। वहीं दशमाशं कुण्डली को सूक्ष्म अध्ययन के लिये देखा जाता है। यदि लग्न, नवांश और दशमाशं तीनों कुण्डलियों में समान या अच्छे योग हों तो व्यक्ति बड़ी राजनीतिक उंचाइयां छूता है। सूर्य, चन्द्र, बुध व गुरु धन भाव में हों व छठे भाव में मंगल, ग्यारहवें घर में शनि, बारहवें घर में राहु व छठे घर में केतु हो तो एसे व्यक्ति को राजनीति विरासत में मिलती है। यह योग व्यक्ति को लम्बे समय तक शासन में रखता है। जिसके दौरान उसे लोकप्रियता व वैभव की प्राप्ति होती है। वहीं वृषश्चिक लग्न की कुण्डली में लग्नेश बारहवे में गुरु से दृ्ष्ट हो शनि लाभ भाव में हो, राहु -चन्द्र चौथे घर में हो, स्वराशि का शुक्र सप्तम में लग्नेश से दृ्ष्ट हो तथा सूर्य ग्यारहवे घर के स्वामी के साथ युति कर शुभ स्थान में हो और साथ ही गुरु की दशम व दूसरे घर पर दृष्टि हो तो व्यक्ति प्रखर व तेज नेता बनता है। सारांश यह कि कर्क, सिंह और वृश्चिक लग्न या चंद्र राशि होने पर राजनीतिक सफलता मिलने की सम्भावनाएं मजबूत होती हैं। ===================================================================== जानिए कैसे राजनीती में राहु की भूमिका होती है विशेष-- ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की राजनीति में राहु का महत्वपूर्ण स्थान है। राहू को सभी ग्रहों में नीतिकारक ग्रह का दर्जा दिया गया है। इसका प्रभाव राजनीति के घर से होना चाहिए। राहु के शुभ प्रभाव से ही नीतियों के निर्माण व उन्हें लागू करने की क्षमता व्यक्ति विशेष में आती है। राजनीति के घर (दशम भाव) से राहु का संबंध बने तो राजनेता में स्थिति के अनुसार बात करने की योग्यता आती है। तीसरे, छठे भाव में स्तिथ उच्च का या मूल त्रिकोर का राहू भी बड़े राजनैतिक योग में सहायक है।राहु आज की राजनीति का हीरो है, कारण कि आज वर्तमान राजनीति में सफल होने के लिए राहु का अनुकूल और शुभ होना बहुत जरुरी है । यदि राहू अनुकूल परिणाम न दे तो जातक राजनीती में एक बार नहीं कई बार असफल हो जाता है । सफल राजनेताओं की कुंडली में राहु का संबंध छठे, सातवें, दसवे व ग्यारहवें भाव से देखा गया है। छठे भाव को सेवा का भाव कहते हैं। व्यक्ति में सेवा भाव होने के लिए इस भाव से दशम या दशमेश का संबंध होना चाहिए। सातवां भाव दशम से दशम है इसलिए इसे विशेष रूप से देखा जाता है। ============================================================================== राजनैतिक सफलता के कुछ विशेष आवश्यक योग – किसी भी जन्म कुंडली के दसवें घर को राजनीति का घर कहते हैं। सत्ता में भाग लेने के लिए दशमेश और दशम भाव का मजबूत स्थिति में होना आवश्यक है। दशम भाव में उच्च, मूल त्रिकोण या स्वराशिस्थ ग्रह के बैठने से व्यक्ति को राजनीति के क्षेत्र में बल मिलता है। गुरु नवम भाव में शुभ प्रभाव में स्थित हो और दशम घर या दशमेश का संबंध सप्तम भाव से हो तो व्यक्ति राजनीति में सफलता प्राप्त करता है। सूर्य राज्य का कारक ग्रह है अत: यह दशम भाव में स्वराशि या उच्च राशि में होकर स्थित हो और राहू छठे, दशवें व ग्यारहवें भाव से संबंध बनाए तो राजनीति में सफलता की प्रबल संभावना बनती है। इस योग में वाणी के कारक (द्वितीय भाव के स्वामी) ग्रह का प्रभाव आने से व्यक्ति अच्छा वक्ता बनता है। ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की जब शनि दशम भाव में हो या दशमेश से संबंध बनाए और इसी दशम भाव में मंगल भी स्थित हो तो व्यक्ति समाज के लोगों के हितों के लिए राजनीति में आता है। यहां शनि जनता का हितैषी है और मंगल व्यक्ति में नेतृत्व का गुण दे रहा है। दोनों का संबंध व्यक्ति को राजनेता बनने के गुण प्रदान करेगा। सूर्य और राहु के अमात्यकारक बनने से व्यक्ति रुचि होने पर राजनीति के क्षेत्र में सफलता पाने की संभावना रखता है और समाज में मान-सम्मान तथा उच्च पद की प्राप्ति होती है। जन्मकुंडली, नवमांश तथा दशमांश तीनों कुंडलियों में समान तथा योग व्यक्ति को राजनीति में ऊंचाइयों पर ले जाते हैं। यदि सूर्य स्व या उच्च राशि (सिंह, मेष) में होकर केंद्र, त्रिकोण आदि शुभ भावो में बैठा हो तो राजनीति में सफलता मिलती है। सूर्य दशम भाव में हो या दशम भाव पर सूर्य की दृष्टि हो तो राजनीति में सफलता मिलती है। सूर्य यदि मित्र राशि में शुभ भाव में हो और अन्य किसी प्रकार पीड़ित ना हो तो भी राजनैतिक सफलता मिलती है। शनि यदि स्व, उच्च राशि (मकर , कुम्भ, तुला) में होकर केंद्र त्रिकोण आदि शुभ स्थानों में बैठा हो तो राजनीती में अच्छी सफलता मिलती है। 5.यदि चतुर्थेश चौथे भाव में बैठा हो या चतुर्थेश की चतुर्थ भाव पर दृष्टि हो तो ऐसे व्यक्ति को विशेष जनसमर्थन मिलता है। चतुर्थेश का स्व या उच्च राशि में होकर शुभ स्थानं में होना भी राजनैतिक सफलता में सहायक होता है। बृहस्पति यदि बलि होकर लग्न में बैठा हो तो राजनैतिक सफलता दिलाता है। दशमेश और चतुर्थेश का योग हो या दशमेश चतुर्थ भाव में और चतुर्थेश दशम भाव में हो तो ये भी राजनीती में सफलता दिलाता है सूर्य और बृहस्पति का योग केंद्र ,त्रिकोण में बना हो तो ये भी राजनैतिक सफलता दिलाता है। बुध-आदित्य योग (सूर्य + बुध) यदि दशम भाव में बने और पाप प्रभाव से मुक्त हो तो राजनैतिक सफलता दिलाता है। विशेष – कुंडली में सूर्य , शनि और चतुर्थ भाव बलि होने के बाद व्यक्ति को राजनीति में किस स्तर तक सफलता मिलेगी यह उसकी पूरी कुंडली की शक्ति और अन्य ग्रह स्थितियों पर निर्भर करता है। जिन लोगो की कुंडली में सूर्य नीच राशि (तुला) में हो राहु से पीड़ित हो अष्टम भाव में हो या अन्य प्रकार पीड़ित हो तो राजनीति में सफलता नहीं मिल पाती या बहुत संघर्ष बना रहता है। शनि पीड़ित या कमजोर होने से ऐसा व्यक्ति चुनावी राजनीति में सफल नहीं हो पाता, कमजोर शनि वाले व्यक्ति की कुंडली में अगर सूर्य बलि हो तो संगठन में रहकर सफलता मिलती है। ================================================================================== जानिए जन्म लग्न से राजनीति के योग--- मेष लग्न- प्रथम भाव में सूर्य, दशम में मंगल व शनि हो तथा दूसरे भाव में राहु हो तो जनता का हितैषी राजनेता बनेगा। वृष लग्न- दशम भाव का राहु व्यक्ति को राजनीति में प्रवेश दिलाता है। राहु के साथ शुक्र भी हो तो राजनीति में प्रखरता आती है। मिथुन लग्न- शनि नवम में तथा सूर्य, बुध लाभ भाव में हो तो व्यक्ति प्रसिद्धि पाता है। राहू सप्तम में तथा सूर्य 4, 7 या 10वें भाव में हो तो प्रखर व्यक्तित्व तथा विरोधियों में धाक जमाने वाला राजनेता बनता है। कर्क लग्न-शनि लग्न में, दशमेश मंगल दूसरे भाव में, राहू छठे भाव में तथा सूर्य बुध पंचम या ग्यारहवें भाव में चंद्रमा से दृष्ट हो तो व्यक्ति राजनीति में यश पाता है। सिंह लग्न-सूर्य, चंद्र, बुध व गुरु धन भाव में हों, मंगल छठे भाव में, राहु बारहवें भाव में तथा शनि ग्यारहवें घर में हो तो व्यक्ति को राजनीति विरासत में मिलती है। यह योग व्यक्ति को लम्बे समय तक शासन में रखता है, इस दौरान उसे लोकप्रियता व वैभव प्राप्त होता है। कन्या लग्न- दशम भाव में बुध का संबंध सूर्य से हो, राहु, गुरु, शनि लग्न में हो तो व्यक्ति राजनीति में रूचि लेगा। तुला लग्न- चंद्र, शनि चतुर्थ भाव में हो तो व्यक्ति वाकपटु होता है। सूर्य सप्तम में, गुरू आठवें, शनि नौवें तथा मंगल बुध ग्यारहवें भाव में हो तो राजनीति में अपार सफलता पाता है तथा प्रमुख सलाहकार बनता है। वृश्चिक लग्न-लग्नेश मंगल बारहवें भाव में गुरू से दृष्ट हो, शनि लाभ भाव में हो, चंद्र-राहु चौथे भाव में हो, शुक्र सप्तम में तथा सूर्य ग्यारहवें घर के स्वामी के साथ शुभ भाव में हो तो व्यक्ति प्रखर नेता बनता है। धनु लग्न-चतुर्थ भाव में सूर्य, बुध, शुक्र हों तथा दशम भाव में कर्क का मंगल हो तो तकनीकी सोच के साथ राजनीति करता है। मकर लग्न- राहु चौथे भाव में हो तथा नीचगत बुध उच्चगत शुक्र के साथ तीसरे भाव में हो तो नीचभंग राजयोग से व्यक्ति राजनीति में दक्ष तथा चतुर होता है। कुंभ लग्न- लग्न में सूर्य शुक्र हो तथा दशम में राहू हो तो राहू तथा गुरू की दशा में राजनीति में सफलता मिलती है। गुरू की दशा में प्रबल सफलता मिलती है। मीन लग्न-चंद्र, शनि लग्न में, मंगल ग्यारहवें तथा शुक्र छठे भाव में हो तो शुक्र की दशा में राजनीतिक लाभ तथा श्रेष्ठ धन लाभ होता है। ============================================================================== जानिए राजनीति कारक ग्रहों को-- ज्योतिषाचार्य पंडित दयानन्द शास्त्री ने बताया की एक सफल राजनेता बनने के लिए वैसे तो समस्त नौ ग्रहों का बली होना आवश्यक है किंतु फिर भी सूर्य, मंगल, गुरु और राहु में चार ग्रह मुख्य रूप से राजनीति में सफलता प्रदान करने में सशक्त भूमिका निभाते हैं। साथ ही चंद्रमा का शुभ व पक्ष बली होना भी अति आवश्यक है। सूर्य ग्रह तो है ही सरकारी राजकाज में सफलता का कारक, मंगल से नेतृत्व और पराक्रम की प्राप्ति होती है। गुरु पारदर्शी निर्णय क्षमता एवं विवेक शक्ति प्रदान करता है तथा राहु को ज्योतिष में शक्ति, हिम्मत, शौर्य, पराक्रम, छल कपट और राजनीति का कारक माना गया है। अतः कुंडली में यदि ये चारों ग्रह बलवान एवं शुभ स्थिति में होंगे तो ये एक सशक्त, प्रभावी, कर्मठ, जुझारु एवं प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की नींव पर एक पूर्णतया सरल एवं सशक्त राजनेता रूपी इमारत का निर्माण करेंगे जिस पर राष्ट्र सदैव गौरवान्वित रहेगा। राजनीति में संबंधित भाव: ज्योतिषीय दृष्टि से राजनीति से संबंधित भाव मुख्यतया- लग्न, तृतीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, नवम्, दशम एवं एकादश हैं। लग्न व्यक्ति और व्यक्तित्व है, लग्नेश प्राप्तकर् है। तृतीय भाव सेना, चतुर्थ भाव जनता, पंचम भाव राजसी ठाटबाट एवं मंत्री पद की भोग्यता, षष्ठ भाव युद्ध एवं कर्म, नव भाव भाग्य, दशम् भाव कार्य, व्यवसाय, राजनीति और एकादश लाभ भाव है। दृढ़ व्यक्तित्व, जनमत संग्रह, पराक्रम, जनता का पूर्ण समर्थन, सफलता, धन और मंत्री पद की योग्यता। ये सभी गुण एक राजनेता बनने के लिए परमावश्यक तत्व हैं। साथ ही जब इन भावेशों का संबंध लाभ भाव से बनेगा तो ऐसे विशिष्ट ग्रहयोगों से युक्त कुंडली वाला जातक ''एक सफल राजनेता'' बनेगा। इसमें लेशमात्र भी संदेह नहीं है। राजनीति क्षेत्र के योग: - सूर्य एवं राहु बली होने चाहिए। - दशमेश स्वगृही हो अथवा लग्न या चतुर्थ भाव में बली होकर स्थित हो। - दशम भाव में पंचमहापुरुष योग हो एवं लग्नेश भाग्य स्थान में बली हो तथा सूर्य का भी दशम भाव पर प्रभाव हो। =============================================================================== उपाय – राजनीती से जुड़े या राजनीती में जाने की इच्छा रखने वाले लोगों को सूर्य उपासना अवश्य करनी चाहिये – =====पहला उपाय : आप सुबह जल्दी उठकर नहा धो लें और पूजा घर में पहले अपने इष्ट देव को याद करें. फिर आप निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जाप करें.फिर आप निम्नलिखित मंत्र का 108 बार जाप करें. देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि में परम सुखं, धनं देहि, रूपं देहि, यशो देहि, द्विषो जही | इस मंत्र का जाप आपको रोजाना 108 बार करना है. ये उपाय आपकी कुंडली के नौवें और दसवें भाव वाले ग्रहों की स्थिति को मजबूत करता है और आपके दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलकर आपको राजनीति में सफल बनाता है. ===दुसरा उपाय : एक प्रसिद्ध और सफल राजनेता बनने के लिए आपको 21 शुक्रवार तक माता दुर्गा का व्रत रखना है और 21वें शुक्रवार के दिन आप एक लाल कपड़ा लें और उसमें 42 लौंग, 21 लाल रंग की चूड़ियाँ, 7 कपूर, 5 गुडहल के फुल, 2 चांदी की बिछियाँ, सिंदूर और परफ्यूम रख कर देवी माता के चरणों में अर्पित करें. इस उपाय को मनवांछित राजनितिक सफलता पाने का सबसे सफल उपाय है. =====तीसरा उपाय : आप थोड़ा सा कुमकुम, लाख, कपूर, घी, मिश्री और शहद को मिलाकर एक गाढा पेस्ट तैयार करें. फिर इस पेस्ट से आप पहले माता दुर्गा और फिर खुद को तिलक लगायें. आप इस उपाय को 5, 7 और 11 दिनों तक लगातार अपनाएँ, आपको राजनीति में सफलता अवश्य मिलेगी. ====चौथा उपाय : चौथे उपाय के लिए आप थोड़ी सी मिटटी में पानी व शुद्ध देशी घी मिलाकर 9 गोलियाँ तैयार करें व उन्हें छाया में सूखने के लिए छोड़ दें. जब ये गोलियाँ सुख जाएँ तो इन्हें 9 दिनों तक पीले सिंदूर की डिब्बी में रखें व 9वें दिन ही इन्हें किसी बहते पानी में प्रवाहित कर दें. लेकिन ध्यान रहे कि आपको सिंदूर को प्रवाहित नहीं करना है बल्कि उसे आप संभाल कर रखें और जब भी आप घर से बाहर काम के लिए निकलें तो आप इस सिंदूर का टिका लगाकर ही निकलें. ये उपाय पहले आपको प्रसिद्धि दिलाता है और फिर धीरे धीरे एक सफल नेता. ====पांचवा उपाय : रविवार का दिन सूर्यदेव का होता है जो आपको ज्ञान, बल और समाज में मान सम्मान दिलाते है. तो आप रविवार के दिन पहले सूर्य देव की पूजा करें और फिर उनसे जुडी चीजों जैसेकि लड्डू, ताम्बे के बर्तन, गेहूँ, गुड, माणिक्य, लाल या फिर पीला कपड़ा और लाल चन्दन का दान करें. इससे सूर्य देव प्रसन्न होते है और आपको आपके हर क्षेत्र में सदा सफल होने का आशीर्वाद देते है. ====आदित्य हृदय स्तोत्र का रोज पाठ करें। ====सूर्य को रोज जल अर्पित करें। ===ॐ घृणि सूर्याय नमः का जाप करें। प्रिय पाठकों/मित्रों, ये है कुछ अचूक और असरदार उपाय जिन्हें अपनाकर आप अपनी कुंडली में राजयोग को बना सकते हो और राजनीति में सफलता प्राप्त कर सकते हैं |
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